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Sunday, March 19, 2017

पॉवर हंग्री जनता और चरम लोकप्रियता


यूपी में भाजपा की जीत नही मोदी की जीत है। विगत दिवस इंटेलिजेंस के पूर्व अधिकारी से हो रही चर्चा में उन्होंने कहा था 1980 में जो लोकप्रियता का चरम इंदिरा का था वही इस समय मोदी का है। जनता का विश्वास अभी जिस तरह मोदी पर है उसमें मोदी सही करें या गलत अभी जनता उसे सही मानेगी। कुछ ऐसा ही टाइम मैगजीन ने भी माना।
दरअसल भारत की जनता की वृत्ति ही ऐसी है। पॉवर की भूखी। इंदिरा और मोदी दोनों को पॉवर हंग्री जनता मिली और दोनों ने इसी भूख को और चरम पर ले जाकर दशा और दिशा अपनी ओर कर ली।
दोनों में लोकप्रियता का चरम इतना है कि इनके गलत और नीति विरुध्द निर्णय कोई मायने नही रखेंगे। इसपर जितना भी इनका विरोध और जुबानी हमले होंगे उतने ही मजबूत होंगे।
मित्र की चर्चा का निष्कर्ष था कि लोकप्रियता का ये झोंका 19 तक झंझावात पैदा करता रहेगा और इसका फायदा एमपी में बीजेपी को मिलना अवश्यम्भावी है।
दूसरी ओर कांग्रेस के पास ऐसा कोई चेहरा नही है जो इस लोकप्रिय चेहरे से ध्यान अपनी ओर खींचे। शायद प्रियंका पर दांव लगाया जाये तो कुछ हल निकल सकता है, लेकिन हुकुम के इस इक्के को कब फेंकना है ये भी शातिर खेल का अंग है, वरना बड़े पत्ते गलत चाल से छोटे के आगे ढेर हो जाते हैं।

Wednesday, March 15, 2017

यूपी में 'मुस्लिम बहुल' देवबंद में भाजपा की जीत का सच!



देवबंद में मुसलमानों ने नहीं जिताया भाजपा को, कहानी कुछ और है!


नया शगूफा बाजार में है. उत्तर प्रदेश चुनावों में देवबंद की सीट पर भाजपा की जीत पर बवाल कट रहा है.
कुछ लोग कह रहे हैं कि 80 परसेंट मुस्लिम आबादी वाली सीट से भाजपा जीती तो जीती कैसे! लिहाज़ा गड़बड़ी हुई है. जांच करवाई जाए. वहीं भाजपा समर्थक कह रहे हैं कि यहां से जीतना मुस्लिम तबके में भाजपा की स्वीकार्यता का सबूत है. जब भाजपा पर हिंदू वोटों के सहारे तर जाने का आरोप लगता है, वहीं भाजपा समर्थक देवबंद विजय का काउंटर अटैक शुरू कर देते हैं.

दोनों ही तरफ के लोग तथ्यों के फ्रंट पर गलत हैं. सबसे पहले तो बेसिक फैक्ट ही दुरुस्त करवाए देते हैं कि देवबंद विधानसभा में 80 परसेंट मुस्लिम वोटर्स है ही नहीं. ताजा जनगणना के मुताबिक, लगभग 34 परसेंट मुस्लिम वोटर्स हैं यहां. यानी कि जो दावा किया जा रहा है उसके आधे से भी कम. यानी ये दोनों ही बातें हवा-हवाई लगती हैं कि मुसलमानों ने भाजपा को जिताया या ईवीएम में फ्रॉड हुआ.

देवबंद में कुल मतदाता हैं 3,26,940. इनमें से लगभग 1,10,000 मुस्लिम वोटर्स है. 70,000 के करीब दलित वोटर्स हैं और बाकी ठाकुर, ब्राह्मण, त्यागी, गुर्जर वगैरह. इन 1,10,000 वोटर्स पर ही बवाल है. देवबंद में करीब 71 फीसदी मतदान हुआ था. इसी औसत से अज्यूम किया जाए तो 1,10,000 में से मोटा-मोटी 80,000 मुसलमानों ने वोट किया होगा. कहा जा रहा है कि इन्होंने वोट दिया भाजपा को तभी उसकी जीत मुमकिन हुई. जबकि आंकड़े कुछ और ही कहते हैं.
बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी ने यहां से मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे. क्रमशः माजिद अली और माविया अली. इन दोनों को मिले वोट्स पर अगर एक नज़र भी दौड़ा लें तो माजरा समझ में आ जाता है. माजिद अली को 72,844 वोट मिले हैं और माविया अली को 55,385. दोनों का जोड़ बैठता है 1,28,229. जीतने वाले भाजपा कैंडिडेट को मिले हैं 1,02,244 वोट्स. ये थ्योरी इस वोट काउंट से ही ढेर हो जाती है. अगर एक ही मुस्लिम कैंडिडेट होता तो यूं वोट बंटता नहीं और शायद उसी की जीत भी हो जाती. ‘शायद’ के साथ ये बात लिखी, क्योंकि ऐसा हो ही ये ज़रूरी नहीं.

अगर पिछले चौबीस साल में हुए पांच विधानसभा चुनावों पर नज़र डालें तो ये साफ़ हो जाता है कि यहां भाजपा हमेशा अच्छा प्रदर्शन करती रही है. मुस्लिम गढ़ कहे जाने वाले देवबंद ने बरसों से मुस्लिम विधायक का चेहरा नहीं देखा है. ज़रा नीचे की सूची पर नज़र भर मार लीजिए, मामला स्पष्ट हो जाएगा.

साल               विजेता                               उपविजेता

2012        राजेंद्र सिंह राणा (सपा)             मनोज चौधरी (बसपा)
2007       मनोज चौधरी (बसपा)                शशि बाला पुंडीर (भाजपा)
2002       राजेंद्र सिंह राणा (बसपा)          रामपाल सिंह पुंडीर (भाजपा)
1996        सुखबीर सिंह पुंडीर (भाजपा)       राजेंद्र सिंह राणा (बसपा)
1993        शशि बाला पुंडीर (भाजपा)           मुर्तज़ा (बसपा)


इसे देखकर दो बातें साफ़ हो जाती हैं. एक तो ये कि इस पूरी सूची में कोई मुस्लिम नाम नहीं है. सिर्फ पिछले साल जब उपचुनाव हुए थे तब कांग्रेस से माविया अली जीत गई थी जिनका कार्यकाल सिर्फ साल भर रहा. दूसरा ये कि भाजपा की ज़मीन यहां हमेशा से रही है. 2012 को छोड़ दिया जाए तो हर बार भाजपा कम्पटीशन में रही है. पांच में से दो बार जीती है और दो बार उपविजेता रही है. सिर्फ 2012 में यहां सपा का कैंडिडेट जीता है. उस साल सपा की लहर थी और मुस्लिम कैंडिडेट उनका भी नहीं था.
कहने की बात ये कि भाजपा की देवबंद जीत में अप्रत्याशित जैसा कुछ नहीं है. इस सीट पर जो हुआ वो कमोबेश वही है जो सारे उत्तर प्रदेश में हुआ.

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मुस्लिम इलाकों में जीत


अब आते है कुल  मुस्लिम बहुल ईलाके मे जीत पर
यूपी विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 3 चौथाई से भी ज्यादा सीटों पर जीत दर्ज की। बीजेपी की जीत में सबसे बड़ी बात ये रही कि पार्टी ने उन जिलों में भी जीत दर्ज की, जहां 60 फीसदी मुस्लिम आबादी है। 11 जिलों में 40%, 5 जिलों में 30% और 10 जिलों में 20% मुस्लिम आबादी है। पश्चिमी यूपी के 11 जिलों में 40 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम हैं, फिर भी वहां बीजेपी आगे रही। पाॅलिटिकल एक्सपर्ट योगेश श्रीवास्तव का कहना है- बीजेपी को इतने बड़े स्तर पर जिताने में मुस्लिमों का वोट काफी अहम रहा।


ट्रिपल तलाक मुद्दे पर पार्टी मुस्लिम महिलाओं के मन में जगह बनाने में कामयाब हुई। पार्टी ने खुलेआम मुस्लिम महिलओं के दर्द को समझाकर अपना स्टैंड क्लीयर रखा। इसका फायदा भी मिला। बीजेपी को हमेशा से शियाओं का वोट मिलता रहा है। इस बार पूरी तरह से एकजुट होकर पार्टी को वोट देने वालों में मुस्लिम महिलाओं की संख्या ज्यादा रही।

मुस्ल‍िम कैंड‍िडेट न उतारना
- मुस्ल‍िम का बीजेपी के साथ आने के पीछे सबसे बड़ा कारण किसी भी मुस्लिम को टिकट नहीं देना। सभी पार्टियों ने अपने मुस्लिम कैंडिडेट उतारे, तो मुस्लिम बहुल इलाकों के 25 से 40 फीसदी हिंदूओं ने एकजुट होकर बीजेपी को वोट किया। जैसे किसी सीट पर अगर 40 फीसदी भी मुस्लिम हैं, तो वहां सारी पार्टियों ने मुस्लिमों को उतारा है, लेकिन बीजेपी ने हिंदू को ही प्रत्याशी बनाया और हिंदू वोटर यूनाइट हो गया। गोंडा में 32 फीसदी मुस्लिम। कुल 7 सीट, सातों पर बीजेपी जीती। आजमगढ़ में 38 फीसदी मुस्लिम। कुल सीट 10, बीजेपी ने एक सीट जीती। अंबेडकर नगर में 20 फीसदी मुस्लिम। कुल 5 सीट, 2 पर जीती बीजेपी। फैजाबाद में 30 फीसदी मुस्लिम। कुल सीट 5, पांचों पर बीजेपी जीती। मऊ में 43 फीसदी मुस्लिम। कुल सीट 4, बीजेपी ने 3 सीट जीती। बलरामपुर में 40 फीसदी मुस्लिम। कुल 4 सीट, चारों पर बीजेपी। गाजीपुर में 30 फीसदी मुस्लिम। कुल 7 सीट, बीजेपी ने 5 पर दर्ज की जीत। बहराइच में 20 फीसदी मुस्लिम। कुल 7 सीट, 6 सीटों पर बीजेपी जीती।
कामयाब नहीं रहा विपक्ष
इन  सीटो पर भी हिंदू को जीत मिलना बड़ी बात है। लेकिन उसका कारण भी कहीं न कहीं विपक्ष ने ही दिया है। विपक्ष इस बार मुस्लिमों में नरेंद्र मोदी का डर बनाने में कामयाब नहीं हो पाया। इससे पढ़े-लिखे कुछ फीसदी मुस्लिम वोटरों में नरेंद्र मोदी के प्रति काम और विकास को लेकर अच्छी छवि बनीं रही और यूथ का वोट उन्हें मिला। एक कारण 2014 में सरकार बनने के बाद से नरेंद्र मोदी की किसी योजना में या पाॅलिसी में कुछ भी मुस्लिम विरोधी नहीं रहा। इससे मोदी को लेकर मुस्लिमों के अंदर का डर कम हो गया, फिर नोटबंदी करना अच्छा फैसला रहा।
पूर्वी यूपी का गणित
गोरखपुर में 22 फीसदी मुस्लिम। कुल सीट 9, सभी पर बीजेपी ने जीत दर्ज की है। इलाहाबाद में 28 फीसदी मुस्लिम। कुल सीट 12, बीजेपी ने 8 पर जीत दर्ज की। जौनपुर में 22 फीसदी मुस्लिम। कुल सीट 9, बीजेपी ने 5 सीट जीतीं। औरैया में 28 फीसदी मुस्लिम। कुल सीट 3, तीनों पर बीजेपी। लखनऊ में 20 फीसदी मुस्लिम। कुल सीट 9, बीजेपी 8 पर जीती। सीतापुर में 20 फीसदी मुस्लिम। कुल सीट 9, बीजेपी 8 पर जीती।
क्या है पश्च‍िमी यूपी में मुस्ल‍िम वोट परसेंट
बिजनौर में 67 फीसदी मुस्लिम हैं। कुल सीट 8, बीजेपी 6 पर जीती। गौतमबुद्धनगर में 65 फीसदी मुस्लिम। कुल सीट 3, तीनों पर बीजेपी जीती। अलीगढ़ में 42 फीसदी मुस्लिम। कुल सीट 7, सातों पर बीजेपी जीती। मुजफ्फरनगर में 49 फीसदी मुस्लिम। कुल सीट 6, पूरी बीजेपी ने जीती। प्रबुद्वनगर (शामली) में 42 फीसदी मुस्लिम। कुल सीट 7, बीजेपी को 4 पर मिली जीत। बरेली में 47 फीसदी मुस्लिम। कुल सीट 9, पूरी बीजेपी ने जीती। सहारनपुर में 42 फीसदी मुस्लिम। कुल सीट 7, BJP 4 पर जीती। ज्योतिबाफुले नगर (अमरोहा) में 40 फीसदी मुस्लिम। कुल सीट 3, बीजेपी को 2 पर मिली जीत। मेरठ में 37 फीसदी मुस्लिम। कुल सीट 7, जिसमें 6 पर जीती बीजेपी। मथुरा में 14 फीसदी मुस्लिम। कुल सीट 5, जिसमें 4 पर जीती बीजेपी। गाजियाबाद में 21 फीसदी मुस्लिम। कुल सीट 5, सभी बीजेपी ने जीती। आगरा में 20 फीसदी मुस्लिम। कुल सीट 5, पांचों पर बीजेपी। बागपत में 20 फीसदी मुस्लिम। कुल सीट 3, बीजेपी को 1 पर मिली जीत।
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बीजेपी का प्लान
भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनावों (UP Assembly Elections) में प्रचंड बहुमत हासिल करते हुए सभी अनुमानों को गलत साबित कर दिया. यूपी जैसे बड़े प्रदेश में बीजेपी की जीत के बड़े मायने हैं और इसका असर राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों में स्पष्ट रूप से देखने को मिलेगा. विरोधी पार्टियों को समझ में ही नहीं आ रहा कि आखिर कमी कहां रह गई. खासतौर से समाजवादी पार्टी (SP) और कांग्रेस तो गठबंधन के बाद से जैसे जीत के प्रति आश्वस्त थे, लेकिन यह भी उनके काम नहीं आया और उनको अब तक की करारी हार झेलनी पड़ी. वैसे तो बीजेपी की जीत में कई अहम कारक हैं और विरोधियों के बीच अनिश्चितता के माहौल ने भी इसमें अहम भूमिका निभाई, लेकिन उसका जनता के बीच पहुंचाया गया एक संदेश ऐसा कारक साबित हुआ कि यूपी की जनता ने कांग्रेस, सपा और बीएसपी से दूरी बना ली और उन्होंने बीजेपी के पास जाने में ही भलाई समझी...
साबित किया कि अखिलेश को है केवल 2 की ही चिंता...
विरोधी दलों में जारी उठापटक के बीच बीजेपी (BJP) एक ऐसे बड़े संदेश को जनता के बीच स्थापित करने में सफल रही, जिसने गेमचेंजर की भूमिका निभाई. उसके कार्यकर्ताओं ने गुप्त तरीके से इसे लक्षित वर्ग तक पहुंचाना जारी रखा. हालांकि पीएम मोदी ने इशारों-इशारों में प्रचार के अंतिम दौर में इसका जिक्र किया था. यह संदेश था कि सत्ताधारी समाजवादी पार्टी को केवल दो की ही चिंता है- यादव और मुसलमान! इतना ही नहीं उसने इसके लपेटे में कांग्रेस और बसपा को भी ले लिया.
गौरतलब है कि उत्तरप्रदेश में बेरोजगारी की बड़ी समस्या है और अखिलेश यादव के शासनकाल में नौकरियों में यादवों का बोलबाला देखा गया. ज्यादातर विभागों में इसी जाति के लोगों को नियुक्ति दी गई और अन्य वर्ग इससे वंचित रह गए. भले ही वह पिछड़े थे. UPPSC की परीक्षा में यादव जाति के प्रतिभागियों को मिली बड़ी सफलता ने इस तथ्य को और स्थापित कर दिया. बाद में इस पर इलाहाबाद हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की गई और UPPSC चेयरमैन डॉ. अनिल यादव के कामकाज के तौर तरीकों पर भी आरोप लगे. बाद में कोर्ट ने बोर्ड के चेयरमैन को ही हटा दिया. इससे जनता के बीच यह संदेश गया कि सपा के सत्ता में आने से अन्य वर्गों का कल्याण नहीं होगा और बीजेपी ने इसे ही भुना लिया.
तुष्टीकरण को भी उठाया...
सपा सरकार पर मुसलमानों पर भी अधिक ध्यान देने का आरोप लगा, जिससे एक हद तक हिंदू भी एकजुट होकर बीजेपी की ओर चले गए. कांग्रेस से गठबंधन होने के बाद भी उन्हें इसका फायदा नहीं मिला, क्योंकि कांग्रेस पर तो पहले से ही मुस्लिम तुष्टीकरण के आरोप थे. विकास के नाम पर 'काम बोलता है' का नारा भी फेल रहा, क्योंकि कई लोगों का मानना है कि लखनऊ को छोड़कर कहीं भी विकास कार्य ज्यादा नहीं हुए. खुद उनके विज्ञापन भी लखनऊ केंद्रित रहे.
दूसरी ओर बसपा सरकार के दौरान मायावती पर जाटवों को ही वरीयता देने का आरोप लग चुका था. मतलब जनता के बीच यह संदेश गया कि मायावती वापस सत्ता में आने पर फिर वही करेंगी. फिर क्या था बीजेपी के चुनाव प्रबंधकों और प्रचारकों ने जनता के बीच इस तथ्य को स्थापित कर दिया कि भारतीय जनता पार्टी ही एक ऐसा दल है जो सबके बारे में सोच रहा है और उसी को वोट देने से सबका कल्याण होगा.
इससे अखिलेश यादव और राहुल गांधी को जनता के बीच युवाओं के प्रतिनिधि के रूप में स्थापित करने का कांग्रेस और सपा का प्रयास पूरी तरह फेल हो गया... BJP ने उत्तरप्रदेश की जनता के बीच पैठ बनाने के लिए न केवल अपने संगठन को मजबूत बनाया, बल्कि उसने बिहार वाली गलती नहीं दोहराई और चुनाव को विकास जैसे मुद्दे से नहीं भटकने दिया. कुछ विवाद भी हुए, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित उसके स्टार प्रचारकों ने इनके साथ ही जनता का ध्यान विकास की ओर केंद्रित रखा और ऐतिहासिक जीत दर्ज कर ली…

Thursday, November 1, 2012

विदेशी पूंजी से विकास का अंधविश्वास और FDI

लगभग सात वर्ष पहले की बात है. दूरसंचार क्षेत्र में निजी कंपनियों को लाइसेन्स दिये हुए कुछ वर्ष हो चुके थे. किन्तु इन कंपनियों ने सरकार को लाइसेन्स शुल्क का नियमित भुगतान नहीं किया था और उनके ऊपर अरबों रुपया बकाया हो गया था. जब उनको नोटिस दिए जाने लगे, तो इन कंपनियों ने फरियाद की कि उनका धन्धा ठीक नहीं चल रहा है, उनका शुल्क कम किया जाये और बकाया शुल्क माफ किया जाये. तब भारत सरकार के दूरसंचार मन्त्री श्री जगमोहन, एक सख्त आदमी थे. उन्होंने निजी टेलीफोन कंपनियों की बात मानने से इन्कार कर दिया और बकाया शुल्क जमा नहीं करने पर लाइसेन्स रद्द करने की चेतावनी दी. उन्होंने कहा कि आपका धन्धा नहीं चल रहा है तो बन्द कर दो, लेकिन सरकार को पैसा तो देना पड़ेगा. तब ये कंपनियाँ मिलकर प्रधानमन्त्री कार्यालय में गयीं और वहाँ फरियाद की. प्रधानमन्त्री कार्यालय ने भी उनकी तरफदारी की, किंतु जगमोहन टस से मस नहीं हुए. नतीजा यह हुआ कि जगमोहन को दूरसंचार मन्त्रालय से हटा दिया गया, प्रमोद महाजन को दूरसंचार मन्त्री बनाया गया और निजी कंपनियों की लाइसेन्स शर्तों को बदलकर करीब ५००० करोड़ रुपये की राहत उनको दे दी गई. एक ईमानदार मन्त्री और निजी कंपनियों के बीच संघर्ष में जीत कंपनियों की हुई. इस खेल में कितना कमीशन किसको मिला होगा, इसका अंदाज आप लगा सकते हैं. निजीकरण, उदारीकरण, भूमंडलीकरण के नाम पर यही खेल पिछले डेढ़ दशक से चल रहा है.

दूसरी ओर, ठीक इसी समय देश के कई हिस्सों में किसानों की आत्महत्याएं भी शुरू हो गयी थीं. खेती एक गहरे संकट में फंस चुकी थी, जिसके लिए स्वयं भूमंडलीकरण की नीतियाँ जिम्मेदार थीं. विश्व बैंक के निर्देश पर खाद, बीज, पानी, डीजल, बिजली आदि की कीमतें लगातार बढ़ाई जा रही थीं. विश्व व्यापार संगठन की नई खुली व्यवस्था के तहत खुले आयात के कारण किसानों की उपज के दाम या तो गिर रहे हैं या पर्याप्त नहीं बढ़ रहे हैं. किसानों पर भारी कर्जा हो गया है. देशी – विदेशी टेलीफोन कंपनियों को ५००० करोड़ रुपये की राहत देने वाली सरकार को यह ख्याल नहीं आया कि किसानों का करजा माफ कर दें या खाद – डीजल – बिजली सस्ता कर दें या समर्थन – मूल्य पर्याप्त बढ़ा दें. यदि कंपनियों का धन्धा नहीं चल रहा था, तो किसान की खेती में भी तो भारी घाटा हो रहा है! लेकिन किसानों को, गरीबों को या आम जनता को राहत देना अब सरकार के एजेंडे में नहीं है.


विदेशियों का हुक्म सिर आँखों पर
देशप्रेम के स्थान पर विदेश प्रेम तथा आम जनता के स्थान पर कंपनियों के हितों को बढ़ाना – यही भूमंडलीकरण की नई व्यवस्था का मर्म है. इस अंधे विदेश प्रेम ने हमारे मंत्रियों, अधिकारियों, विशेषज्ञों और अर्थशास्त्रियों की सोचने की शक्ति को भी कुंद कर दिया है. पिछले पन्द्रह वर्षों से उन्होंने मान लिया है कि देश का विकास विदेशी पूंजी और विदेशी कंपनियों से ही होगा. विदेशी पूंजी को आकर्षित करने के लिए और खुश करने के लिए भारत की सरकारों ने पिछले पन्द्रह वर्षों में सारी नीतियाँ और नियम-कानून बदल डाले. पिछले पन्द्रह वर्षों में हमारी संसद तथा विधानसभाओं ने कानूनों में जितने संशोधन किए हैं और नए कानून बनाए हैं, उनकी जाँच की जाए तो पता लगेगा कि ज्यादातर परिवर्तन विदेशी कंपनियों के हित में तथा विदेशी कंपनियों के कहने पर किए गए हैं। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक, एशियाई विकास बैंक, विश्व व्यापार संगठन, अमरीका सरकार या बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कहने पर ये परिवर्तन किए जा रहे हैं. देश की जनता कोई मांग करती है तो सरकार को साँप सूँघ जाता है या या वह लाठी – गोली चलाने में संकोच नहीं करती है. लेकिन विदेशी कंपनियों की मांगें वह एक – एक करके पूरी करती जा रही है.गौरतलब है कि जिस विदेशी पूँजी को लाने और खुश करने के लिए नीतियों-कानूनों में ये सारे परिवर्तन किए जा रहे हैं और जिस पर ही सरकार की, योजना आयोग की, सारी आशाएं केन्द्रित हैं, वह विदेशी पूंजी अभी भी देश में बहुत मात्रा में नहीं आ रह है. उसकी मात्रा धीरे-धीरी बढ़ी है, लेकिन पिछले पांच वर्षों का भी औसत लें, तो भारत के कुल घरेलू पूंजी निर्माण में उसका हिस्सा ४-५ प्रतिशत से ज्यादा नहीं हो पाया है. मात्र ४-५ प्रतिशत पूंजी के लिए हम अपनी सारी नीतिय्यँ कानून बदल रहे हैं और देश को विदेशियों के कहने पर चला रहे हैं, क्या यह उचित है? यह सवाल पूछने का समय आ गया है.
उड़न-छू विदेशी पूंजी
सीमित मात्रा में जो विदेशी पूंजी आ रही है, उसका भी कोई विशेष लाभ देश को नहीं मिल रहा है. विदेशी पूंजी निवेश को दो हिस्सों में बाँटा जा सकता है – पोर्टफोलियो निवेश और प्रत्यक्ष निवेश (FDI). विदेशी पूंजी का लगभग आधा हिस्सा पोर्टफोलियो निवेश के रूप में आ रहा है, अर्थात यह हमारे शेयर बाजार में शेयरों की खरीद-फरोख्त करने और Shares की सट्टेबाजी से कमाई करने आती है. अभी जब Sensex दस हजार से ऊपर पहुंचता है, वह इसी का कमाल है. इस प्रकार, यह पूंजी तो सही अर्थों में देश के अन्दर आती ही नहीं है. इससे देश में कोई नया रोजगार नहीं मिलता या नई आर्थिक उत्पादक गतिविधि चालू नहीं होती है. बल्कि, शेयर बाजार में आई यह विदेशी पूंजी बहुत चंचल और अस्थिर होती है. यह कभी भी वापस जा सकती है और पूरी अर्थव्यवस्था को संकट में डाल सकती है. इसे ‘उड़न-छू पूंजी‘ भी कहा जाता है. दक्षिण-पूर्वी एशिया के देशों में कुछ वर्ष पहले जो संकट आया था, उसमें इसी विदेशी पूंजी के भागने तथा अल्पकालीन विदेशी ऋणों के प्रवाह के बंदे हो जाने का बड़ा योगदान था. इस संकट के पहले इंडोनेशिया, थाईलैण्ड, मलेशिया, फिलीप्पीन, दक्षिण कोरिया आदि देश विश्व बैंक की सफलता के प्रिय उदाहरन थे और इन्हें ‘एशियाई शेर ‘ कहा जाने लगा था. लेकिन विदेशी पूंजी के पलायन ने इन शेरों को अचानक गीदड़ों में बदल दिया. दूसरे देशों के अनुभव से भी हमारे शासक सीखते नहीं हैं, यह एक विडंबना है.
विदेशी कंपनियों का हड़पो अभियानदूसरे प्रकार की विदेशी पूंजी-प्रत्यक्ष विदेशी निवेश- वास्तव में देश के अन्दर आती है. इसे दो भागों में बांटा जा सकता है – (एक) विलय और अधिग्रहण (Merger & Acquisition) तथा (दो) हरित निवेश (Greenfield investment). भारत में प्रत्यक्ष पूंजी निवेश का लगभग आधा हिस्सा तो दूसरी कंपनियों के विलय और अधिग्रहण में लग रहा है अर्थात विदेशी कंपनियां कोई नया कारखाना या नया करोबार शुरु करने के बजाय पहले से चली आ रही देशी कंपनी के कारोबार को खरीद लेती हैं. इससे भी देश में कोई नई उत्पादक गतिविधि नहीं शुरु होती है, रोजगार नहीं बढ़ता है, सिर्फ देश में पहले से चले आ रहे कारोबार के मालिक बदल जाते हैं और उसकी कमाई विदेश जाने लगती है. Parle कंपनी के शीतल पेय व्यवसाय को अमरीका की कोका कोला कंपनी द्वारा खरीदना, टाटा की टोमको कंपनी के साबुन ब्रान्डों तथा साबुन व्यवसाय को हिन्दुस्तान लीवर द्वारा खरीदना, फ्रांसीसी कंपनी लाफ़ार्ज द्वारा सीमेंट के अनेक कारखानों को खरीदना, इसके कुछ उदाहरण हैं. भारत के सरकारी उपक्रमों के शेयर खरीदकर उन पर अपना वर्चस्व कायम करने को भी इस श्रेणी में रखा जाएगा (जैसे मारुति कंपनी पर सुज़ुकी नामक जापानी कंपनी का कब्जा). पूरी दुनिया में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के द्वारा विलय और अधिग्रहण की प्रवृत्ति जोरशोर से चल रही है. इससे बाजारों में चन्द बड़ी कंपनियों का एकाधिकारी वर्चस्व कायम हो रहा है. भारत के विभिन्न वस्तुओं के कारोबार में भी विदेशी कंपनियों का कब्जा तेजी से हुआ है. उदारीकरण के इस दौर में विलय, अधिग्रहण अवं एकाधिकार पर पाबन्दियाँ हटाने के बाद यह संभव हुआ है. इसके लिए ‘एकाधिकार एवं प्रतिबन्धित व्यापार पद्धतियाँ अधिनियम (MRTP Act) को बदला गया है. इस प्रकार, विदेशी पूंजी के आने से प्रतिस्पर्धा का भी लाभ देश को नहीं मिला है, जिसका बहुत गुणगान किया जा रहा था. बल्कि कई क्षेत्रों में एकाधिकारी प्रवृत्तियाँ मजबूत हुई हैं.
इस प्रकार जिस हरित निवेश से ही देश में उत्पादन, आय और रोजगार बढ़ने की कुछ उम्मीद की जा सकती है, वह देश में आ रही पूंजी का मात्र एक-चौथाई है. इसके बल पर भारत के शासक कैसे देश के विकास की उम्मीद कर रहे हैं, यह एक हैरानी का विषय है. इसे अंधविश्वास या अंधश्रद्धा ही कहा जा सकता है. महाराष्ट्र के प्रगतिशील समूहों ने अंधश्रद्धा निर्मूलन का काम काफी लगन से किया है. अब उन्हें भूमण्डलीकरण की इन अंधश्रद्धाओं के निर्मूलन का भी बीड़ा उठाना चाहिए.
पूरा देश विदेशी कंपनियों के हवाले
इसी प्रकार, निजीकरण की नीति पर भी भारत सरकार तथा हमारी राज्य सरकारें अंधे की तरह चल रही हैं. यूरोप के कई देशों में जितना निजीकरण नहीं हुआ, उससे ज्यादा ज्यादा निजीकरण भारत में हो चुका है. विदेशी कंपनियों के लिए जिस तरह से दरवाजे खोले गए हैं और पूरी छूट दे दी गई है, उस स्थिति में निजीकरण का मतलब विदेशीकरण ही है अर्थात देर-सबेर विदेशी कंपनियों का वर्चस्व यहाँ कायम हो जाएगा. देश के उद्योग, खेती, खदानें, बैंक, बीमा, शेयर बाजार, बिजली, हवाई अड्डे, सड़कें, होटल, भवन निर्माण, मीडिया, शिक्षा, चिकित्सा, टेलीफोन, कानूनी सेवाएं, आडिट, पानी व्यवसाय – सबको विदेशियों के लिए खोला जा रहा है और उन्हे दावत दी जा रही है एक ईस्ट इण्डिया कंपनी के कारण भारत को २०० वर्षों की गुलामी और बरबादी झेलनी पड़ी थी. अब हजारों विदेशी कंपनियाँ देश में पैर जमा रही हैं, तब देश का भविष्य क्या होगा, इसकी चिन्ता सरकार में किसी को नहीं है. विदेशी कंपनियों को प्रवेश देने का सरकार का सबसे ताजा पैकेज खुदरा व्यापार के क्षेत्र में है. यह एक प्रकार से भारत में बढ़ती बेरोजगारी की स्थिति में अंतिम शरणस्थली है. जब कोई और रोजगार नहीं मिला, तो माँ-बाप बेटे के लिए दुकान खोल देते हैं. लेकिन अब वहाँ भी विदेशी कंपनियों का हमला शुरु हो जाएगा.
जिसे विनिवेश (disinvestment) कहा जा रहा है, उसका भी औचित्य संदेहास्पद है. भारत सरकार हर बजट में सरकारी उद्यमों को बेचने के लक्ष्य रखती है और तेजी से उनको बेचती जा रही है. सरकार का यह काम वैसा ही है, जैसे कोई बिगड़ा हुआ, आवारा, कामचोर बेटा स्वयं कुछ कमाने के बजाय बाप-दादे की कमाइ हुई संपत्ति को बेचता जाए. भारत सरकार ठीक वही कर रही है. इससे बड़ी वित्तीय गैर जिम्मेदारी और क्या हो सकती है, क्योंकि यह संपदा एक न एक दिन तो खतम हो ही जाएगी? विश्व बैंक के निर्देश पर वित्तीय अनुशासन के लिए भारत सरकार ने ‘वित्तीय जिम्मेदारी एवं बजट प्रबंधन अधिनियम‘ तो पारित किया है, लेकिन उसमें इसे वितीय गैर-जिम्मेदारी नहीं माना गया है. उसका मतलब तो सिर्फ गरीबों और आम जनता की भलाई के लिए किए जाने वाले खर्चों में कटौती करते जाना है.
पहले सरकार ने कहा कि जिन सरकारी उपक्रमों में हानि हो रही है, उन्हें बेचा जाएगा. हानि क्यों हो रही है, उसे कैसे दूर किया जा सकता है, यह विचार तथा कोशिश करने की जरूरत सरकार ने नहीं समझी. कई मामलों में तो स्वयं सरकार या उच्च पदस्थ अफसरों के निर्णयों, नीतियों और लापरवाही के कारण ये हानियाँ हुईं और बढ़ीं. लेकिन अब तो हानि की बात एक तरफ रह गयी है. सरकार उन सरकारी उद्यमों को बेच रही है, जो मुनाफे में चल रहे हैं. इसका कारण भी स्पष्ट है - देशी-विदेशी कंपनियां उन उपक्रमों को आखिर क्यों खरीदेंगे, जो घाटे में चल रहे हैं ? इसलिए बजट के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए अब लाभ वाले सरकारी उपक्रमों को बेचा जा रहा है. अब तो ‘नवरत्नों’ की बारी भी आ गयी है.

तिब्बत मसले पर सरदार पटेल का ऐतिहासिक पत्र

नई दिल्ली
7 नवंबर, 1950
मेरे प्रिय जवाहरलाल,
चीन सरकार ने हमें अपने शांतिपूर्ण उद्देश्यों के आंडबर में उलझाने का प्रयास किया है। मेरा यह मानना है कि वह हमारे राजदूत के मन में यह झूठ विश्वास कायम करने में सफल रहे कि चीन तिब्बत की समस्या को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाना चाहता है। चीन की अंतिम चाल, मेरे विचार से कपट और विश्र्वासघात जैसा ही है। दुखद बात यह है कि तिब्बतियों ने हम पर विश्र्वास किया है, हम ही उनका मार्गदर्शन भी करते रहे हैं और अब हम ही उन्हें चीनी कूटनीति या चीनी दुर्भाव के जाल से बचाने में असमर्थ हैं। ताजा प्राप्त सूचनाओं से ऐसा लग रहा है कि हम दलाई लामा को भी नहीं निकाल पाएंगे । यह असंभव ही है कि कोई भी संवेदनशील व्यक्ति तिब्बत में एंग्लो-अमेरिकन दुरभिसंधि से चीन के समक्ष उत्पन्न तथाकथित खतरे के बारे में विश्र्वास करेगा।


पिछले कई महीनों से रूसी गुट से परे हम ही केवल अकेले थे जिन्होंने चीन को संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता दिलवाने की कोशिश की तथा फारमोसा के प्रश्न पर अमेरिका से कुछ न करने का आश्र्वासन भी लिया।

मुझे इसमें संदेह हैं कि चीन को अपनी सदिच्छाओं, मैत्रीपूर्ण उद्देश्यों और निष्कपट भावनाओं के बारे में बताने के लिए हम जितना कुछ कर चुके हैं, उसमें आगे भी कुछ किया जा सकता है। हमें भेजा गया उनका अंतिम टेलिग्राम घोर अशिष्टता का नमूना है। इसमें न केवल तिब्बत में चीनी सेनाओं के घुसने के प्रति हमारे विरोध को खारिज किया गया है बल्कि परोक्ष रूप से यह गंभीर संकेत भी किया गया है कि हम विदेशी प्रभाव में आकर यह रवैया अपना रहे हैं। उनके टेलिग्राम की भाषा साफ बताती है कि यह किसी दोस्त की नहीं बल्कि भावी शत्रु की भाषा हैं। इस सबके पटाक्षेप में हमें इस नई स्थिति को देखना और संभालना होगा जिसमें तिब्बत के गायब हो जाने के बाद जिसका हमें पता था चीन हमारे दरवाजे तक पहुंच गया है। इतिहास में कभी भी हमें अपनी उत्तर-पूर्वी सीमा की चिंता नहीं हुई है। हिमालय श्रृंखला उत्तर से आने वाले किसी भी खतरे के प्रति एक अभेद्य अवरोध की भूमिका निभाती रही है। तिब्बत हमारे एक मित्र के रूप में था इसलिए हमें कभी समस्या नहीं हुई। हमने तिब्बत के साथ एक स्वतंत्र संधि कर उसकी स्वायत्तता का सम्मान किया है। उत्तर-पूर्वी सीमा के अस्पष्ट सीमा वाले राज्य और हमारे देश में चीन के प्रति लगाव रखने वाले लोग कभी भी समस्या का कारण बन सकते हैं।

चीन की कुदृष्टि हमारी तरफ वाले हिमालयी इलाकों तक सीमित नहीं है, वह असम के कुछ महत्वपूर्ण हिस्सों पर भी नजर गड़ाए हुए है। बर्मा पर भी उसकी नजर है। बर्मा के साथ और भी समस्या है क्योकि उसकी सीमा को निर्धारित करने वाली कोई रेखा नहीं है जिसके आधार पर वह कोई समझौता कर सके। हमारे उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में नेपाल, भूटान, सिक्किम, दार्जिलिंग और असम के आदिवासी क्षेत्र आते हैं। संचार की दृष्टि से उधर हमारे साधन बड़े ही कमजोर व अपर्याप्त है; सो यह क्षेत्र 'कमजोर' है। उधर कोई स्थायी मोर्चे भी नहीं हैं
इसलिए घुसपैठ के अनेकों रास्ते हैं। मेरे विचार से अब ऐसी स्थिति आ गई है कि हमारे पास आतुमसंतुष्ट रहने या आगे-पीछे सोचने का समय नहीं है। हमारे मन में यह स्पष्ट धारणा होनी चाहिए कि हमें क्या प्राप्त करना है और किन साधनों से प्राप्त करना है।

इन खतरों के अलावा हमे गंभीर आंतरिक संकटों का भी सामना करना पड़ सकता है। मैने (एच०वी०आर०) आयंगर को पहले ही कह दिया है कि वह इन मामलों की गुप्तचर रिपोर्टों की एक प्रति विदेश मंत्रालय भेज दें। निश्चित रूप से सभी समस्याओं को बता पाना मेरे लिए थकाऊ और लगभग असंभव होगा। लेकिन नीचे मैं कुछ समस्याओं का उल्लेख कर रहा हू जिनका मेरे विचार में तत्काल समाधान करना होगा और जिन्हें दृष्टिगत रखते हुए ही हमें अपनी प्रशासनिक या सैन्य नीतियां बनानी होंगी तथा उन्हें लागू करने का उपाय करना होगा :
  1. सीमा व आंतरिक सुरक्षा दोनों मोर्चों पर भारत के समक्ष उत्पन्न चीनी खतरे का सैन्य व गुप्तचर मूल्यांकन। 
  2. हमारी सैन्य स्थिति का एक परीक्षण।
  3. रक्षा क्षेत्र की दीर्घकालिक आवशयकताओं पर विचार.
  4. हमारे सैन्य बलों के ताकत का एक मूल्यांकन.
  5. संयुक्त राष्ट्र में चीन के प्रवेश का प्रश्न.
  6. उत्तरी व उत्तरी-पूर्वी सीमा को मजबूत करने के लिए हमें कौन से राजनीतिक व प्रशसनिक कदम उठाने होंगे?
  7. चीन की सीमा के करीब स्थित राज्यों जैसे यू०पी०, बिहार, बंगाल, व असम के सीमावर्ती क्षेत्रों में आंतरिक सुरक्षा के उपाय.
  8. इन क्षेत्रों और सीमावर्ती चौकियों पर संचार, सड़क, रेल, वायु और बेहतर सुविधाओं में सुधार.
  9. ल्हासा में हमारे दूतावास और गयांगत्से व यातुंग में हमारी व्यापार चौकियों तथा उन सुरक्षा बलों का भविष्य जो हमने तिब्बत में व्यापार मार्गो की सुरक्षा के लिए तैनात कर रखी हैं. 
  10. मैकमोहन रेखा के संदर्भ में हमारी नीति.

आपका
वल्लभभाई पटेल
(www.visfot.com से साभार)

Saturday, October 27, 2012

क्या पैगम्बर मूसा,ईसा,आदम भारत में दफन है?

क्या वायविल और कुरआन में वर्णित “व्लेस लैंड” या “महफूज़ जगह” भारत में है?

क्या जीसस ने अपने जीवन के 18 वर्ष से अधिक भारत में व्ययतीत किये थे ?

क्या जीसस हेमिस मोनास्ट्री लद्दाख और कश्मीर में रहे थे?

क्या जीसस जीवन के अंतिम दिनों में पुन बापस भारत आये थे?

क्या पैगम्बर मूसा,ईसा,आदम,नुह,और सीश भारत में दफन है?

क्या पैगम्बर आदम स्वर्ग से धरती पर भारत में उतारे गए,और जीवन के अधिकाँश समय भारत में रहे,यहीं उनकी मृत्यु और अंतिम संस्कार हुआ,और उनकी कब्र भी भारत में है?

जीसस की 12 से 30 वर्ष की आयु अर्थात किशोरावस्था के 18 वर्षों का विवरण बायविल सहित किसी ईसाई धर्म ग्रन्थ में नहीं है.जीसस के भारत में रहने के विषय में सर्वप्रथम 1894 ई. में एक रुसी युद्ध संवाददाता निकोलस नातोविच “लद्दाख में हेमिस मोनास्ट्री ” के साक्ष्य प्रस्तुत करते हुए दावा किया था.
लिंक देखें -
http://www.rickrichards.com/jc/Jesus1.html
http://www.sacred-texts.com/chr/uljc/index.htm
मोनास्ट्री के अभिलेखों में “ईसा (जीसस का अरेबिक रूपांतरण ईसा )का जीवन,सर्वोत्तम पुत्र ” के रूप में दर्ज है और स्वामी अभेदानंद ने 1922 में इस स्थान का भ्रमण करते हुए साक्ष्यों का अवलोकन किया,और जीसस के भारत सम्बन्धी पूर्व दावों की पुष्टि की. 1869 ई. में लुईस जेकोलियत ने श्री कृष्ण को जीसस क्रिस्ट बताते हुए,इस सम्बन्ध में साक्ष्य सहित “भारत में वायविल,या जीसस कृष्ण का जीवन” पुस्तक लिखी 1908 ई. में “आकाशिक रिकार्ड” लेवी एच. दाव्लिंग ने “जीसस के वायविल विवरण से गुम “खोये 18 वर्षों के जीवन” पर विस्तृत प्रकाश डालते हुए दावा किया,कि जीसस इन वर्षों में भारत में रहते हुए ,भारत के अतिरिक्त तिब्बत,परसिया,असीरिया,ग्रीस और मिस्र भ्रमण को भी गए.

jesus indiajesus news
जीसस के भारत सन्दर्भ में समाचारपत्रों में प्रकाशित रिपोर्ट्स
rosebel shrinejesus real grave kashmir
कश्मीर में सूफी युसफ अल दरगाह,जिसे ईसा की कव्र बताया जाता है.
jesus route to india and chinajesus and moses india
जीसस के भारत आने और अन्य जगहों को जाने सम्बन्धी मार्ग नक्शा
jesus kashmirroza bal grave
दरगाह रोज़ा बल कश्मीर,जिसे जीसस से जोड़कर देखा जाता है.
map to gravenotovitch
दरगाह की स्थिति दर्शाते भौगोलिक मानचित्र
jesus kashmirhemis monastry laddaakh
हेमिस मोनास्ट्री लद्दाख,माना जाता है,जीसस ने १८ वर्ष यहाँ व्ययतीत किये.
wikipeadia notovitchswami abhayaanand<

क्या मोहनजोदड़ो सभ्यता एलियन ने नष्ट की थी?

ancient mohanjodaro
हड़प्पा सभ्यता में मोहनजोदड़ो एक रहस्यपूर्ण पुरातात्विक साक्ष्य अपने में समेटे हुए है,मोहनजोदड़ो अर्थात मृतकों का टीला…….ये नाम इसलिए पड़ा,क्योंकि इस स्थान पर बहुत से मानव कंकाल और अस्थियाँ प्राप्त हुई हैं.अब तक ये समझा जाता रहा था,कि मोहनजोदड़ो हड़प्पा काल में सभ्यता का एक कब्रस्तान रहा होगा…..और ये तथ्य काफी समय तक सही माना जाता रहा है. पर आधुनिक अनुसन्धान और साक्ष्यों के विश्लेषण कुछ और ही कहानी प्रकट कर रहे हैं.
mohanjo daro road and skeletons
मोहनजोदड़ों में उत्खनित अधिकाँश कंकाल अधिकतर घरों के बाहर मुख्य सड़कों पर बिखरे मिले हैं,और अधिकतर एक ही दिशा कि ओर अग्रसर हैं….ऐसा प्रतीत होता है कि तात्कालिक सभ्यता के लोगों ने अन्तरिक्ष में कोई वीभत्स और विस्मयकारी घटित होते देखा,
hadappa bull seal
जैसे कोई धुंद,धुंआ,दावानल अथवा कोई प्राकृतिक आपदा जो अन्तरिक्ष से उनकी ओर बढ़ रही हो . आसमान से शहर की ओर बढती इस आपदा से घबराकर लोग घरों से निकलकर सड़कों पर भागे होंगे,ताकि उस प्रकोप से बच सकें……पर संभवता सड़कों पर पहुँचते-पहुँचते एक प्रलयकारी विस्फोट नें सबको निगल लिया होगा. इस स्थान पर किसी भयंकर बाढ़,भूकंप,ज्वालामुखी विस्फोट,तड़ित अथवा भयंकर तूफ़ान आने के भी कोई साक्ष्य नहीं मिले हैं.अर्थात वहां ये अकस्मात् विनाश की प्राकृतिक आपदा से घटित नहीं हुआ.
evidance
फिर इतने लोग एक साथ कैसे मरे,इसका उत्तर मिलता है,सड़कों के दोनों बनी दीवारों की कच्ची मिटटी की ईंटों में,जिस स्थान पर अधिकाँश नर कंकाल मिले हैं,उस सड़क के दोनों ओर की दीवारों में लगी कच्ची ईंटें पिघल गयी,और ईंटें केवल एक दिशा में ही पिघली हुई हैं.

भौतिकी के सिद्धांत के अनुसार सामान्यत: भयंकर से भयंकर आग (दावानल) भी इन ईंटों को इस प्रकार नहीं पिघला सकती. वैज्ञानिकों के अनुसार ईंटों का इस प्रकार पिघलना केवल परमाणु विस्फोट की घटना से संभव है. इस स्थान पर परमाणु विस्फोट का दूसरा साक्ष्य है,इस जगह की बड़ी हुई रेडियो धार्मिकता,अर्थात हवा में रेडियो धर्मी पदार्थों की सामान्य से अधिक मौजूदगी,हज़ारों साल पूर्व हुई घटना के स्थान पर आज भी रेडियो धार्मिकता का स्तर बड़ा हुआ है,जो पुष्टि करता है,यहाँ कभी भयंकर परमाणु विस्फोट हुआ अवश्य था.

Friday, February 24, 2012

चित्रकूट, रैगांव अमरपाटन में भाजपा बदलेगी अपनी सीट

जुगुलकिशोर बागरी
लगातार दूसरी पारी खेल रही मध्य प्रदेश भाजपा को 2013 में होने वाले विधानसभा चुनावों में भारी मशक्कत करना पड़ सकता है। 230 विधानसभा सीटों वाले मध्य प्रदेश में 155 सीटों पर भाजपा की हालत पतली ही दिख रही है। इसका कारण शिवराज सिंह चौहान का मूल रूप से नौकरशाहों पर निर्भर होना ही बताया जा रहा है। शिव के इशारों को नौकरशाह बखूबी समझ रहे हैं किन्तु सांसद विधायकों और कार्यकर्ताओं की उपेक्षा शिवराज पर भारी पड़ने वाली है।

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के करीबी सूत्रों का कहना है कि शिव का राज पांच
सुरेन्द्र सिंह चित्रकूट
लोग मिलकर चला रहे हैं। ‘‘मुख्यमंत्री जी की मंशा है‘‘ के जुमले को पूर्व प्रधानमंत्री स्व.राजीव गांधी के शासनकाल की तरह ही इस्तेमाल किया जा रहा है। कहा जा रहा है कि सीएम द्वारा दिए गए निर्देशों को सिर्फ मुख्य सचिव को दिया जाता है। फिर सीएस द्वारा संभागायुक्तों को बुलाकर उन्हें मुख्यमंत्री की इच्छा से आवगत करा दिया जाता है। तीसरी कड़ी में संभागायुक्तों द्वारा जिला कलेक्टर्स को बुलाकर निर्देश दे दिए जाते हैं। अगर कोई कलेक्टर इस बारे में सवाल करता है कि अगर विधायक या सांसद ने कुछ हटकर चाहा तो? इस पर उन्हें कह दिया जाता है कि सीएम साहब की यही इच्छा है बस, बाकी सबको हाशिए पर डाल दिया जाए। संभवतः यही कारण है कि काडर बेस्ड भारतीय

रामखेलामन पटेल
जनता पार्टी का जनाधार दिनों दिन गिर रहा है। इसके साथ ही साथ प्रदेश में सरकारी कर्मचारियों द्वारा रोजाना करोड़ों रूपए उगले जा रहे हैं। कार्यकर्ता इससे आज़िज आ चुके हैं। कहा जा रहा है कि सांसद और विधायक निधि में भी बंदरबांट जारी है। आलम यह है कि प्रदेश में अनेक सांसद विधायकों द्वारा समाचार पत्रों में विज्ञापन छपवाकर विज्ञापन के देयकों के भुगतान भी पत्रकारों से दो तीन नाम मांगकर उनके नाम पर किए जाने की शिकायतें अब आम हो गई हैं।
इन इलाकों में भाजपा की हालत खराब
दिमनी, अम्बाह, अटेर, मेहगांव, ग्वालियर पूर्व, सेवढ़ा, शिवपुरी, कोलारस, बामोरी, चंदेरी, जतारा, चंदला (अजा), बिजावर, पथरिया, दमोह, पवई, गुन्नौर (अजा), चित्रकूट, रैगांव (अजा), अमरपाटन, देवतालाब, मनगवां (अजा), सिहावल, कोतमा, पुष्पराजगढ़ (अजजा), निवास (अजजा), बैहर (अजजा), लखनादौर (अजजा), अमरवाड़ा (अजजा), सौंसर, परासिया (अजा), बैतूल, घोड़ाडोंगरी (अजजा), नरेला, भोपाल मध्य, नरसिंहगढ़, हाट पिपलिया, खातेगांव, पंधना (अजजा), नेपानगर (अजजा), अलीराजपुर (अजजा), मनावर, धार, इंदौर-5, राऊ, मंदसौर, मल्हारगढ़, जावद, बीना (अजा), सेमरिया, बडऩगर।

शिवराज हैटट्रिक करेंगे या नहीं

इस सवाल का जवाब ढूंढने में लगी खुफिया एजेंसी की रिपोर्ट कहती है कि प्रदेश की 155 से ज्यादा सीटों पर भाजपा की हालत बहुत खराब है। जिन मुद्दों पर भाजपा 2003 में जीती थी, उन्हीं मुद्दों पर अंडरकरंट दिख रहा है। लोकसभा चुनावों के अप्रत्याशित परिणामों का असर भी इन सीटों पर दिखाई दे रहा है। अन्य राज्यों से लगी विधानसभा सीटों पर भी भाजपाविरोधी लहर साफ दिख रही है।
मध्यप्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव है। लेकिन 2003 में दिग्विजय सिंह को गद्दी से उतारकर भाजपा ने जिन मुद्दों पर सरकार बनाई थी, वह मुद्दे आज उसके खिलाफ जा रहे हैं। इसके बाद भी भाजपा फीलगुड में है। दूसरी ओर कांग्रेस में गुटबाजी हावी है। बावजूद इसके अंडरकरंट कांग्रेस के पक्ष में है। भोपाल से प्रकाशित पाक्षिक ‘बिच्छू डॉट कॉम‘ ने खुफिया एजेंसी के सर्वे का हवाला देकर कहा है कि कि 230 सीटों वाली मध्यप्रदेश विधानसभा की 155 सीटों पर भाजपा की हालत बेहद खराब है।
सरकार विरोधी अंडरकरंट बहुत तेज है। इसकी झलक प्रदेश 2009 के लोकसभा चुनावों में देख चुका है। सालों से संसद जा रहे भाजपा के धुरंधरों को उनकी परंपरागत सीटों पर ही ध्वस्त होते देखा था। 2013 के विधानसभा चुनावों के मद्देनजर सरकार ने एक खुफिया एजेंसी से सर्वे कराया है। इसमें सिर्फ वास्तविक राजनीतिक स्थिति का आकलन करने का काम सौंपा गया था। कई जिलों में 2003 में भाजपा ने कांग्रेस का सूपड़ा साफ किया था। इनमें अधिकांश विधानसभा सीटें अनुसूचित जनजाति (आदिवासी) वर्ग से थी। अब हालात बदल गए हैं। इन जिलों में कांतिलाल भूरिया के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनने (केबी फेक्टर) और विधानसभा में विपक्ष की नेता रहीं जमुनादेवी के सुहानुभूति वोटों का असर दिखाई देगा। उत्तरप्रदेश के साथ ही महाराष्ट्र की सीमा से लगी सीटों पर दूसरे राज्यों की राजनीति का सीधा असर है।

फीलगुड कहीं शाइन कम न कर दें
2004 के लोकसभा चुनावों में फीलगुड और इंडिया शाइनिंग ने भाजपा की उम्मीदों पर पानी फेर दिया था। इसके बाद भी मध्यप्रदेश सरकार इसी फार्मूले पर आगे बढ़ती दिखाई दे रही है। भाजपा के खिलाफ ग्वालियर-चंबल, विंध्य और बुंदेलखंड में जबरदस्त अंडरकरंट हैं। मालवा के कई आदिवासी क्षेत्रों में जहां भाजपा अपना जनाधार बढ़ाने के लिए तेजी से सक्रिय है वहां बेरोजगारी के चलते तेजी से पलायन हो रहा है। विंध्य में कुपोषण और भुखमरी के कारण लोगों में सरकार के प्रति आक्रोश है तो बुंदेलखंड में बेरोजगारी उसकी मुश्किल बढ़ा सकती है। चुनाव से पहले सड़कों को ठीक करने की सरकार की मंशा भी उसके लिए उल्टा-दांव पड़ सकती है। सड़कों की दुर्दशा से भाजपा के शहरी मतदाता भी उससे नाराज हैं। इन मतदाताओं की माने तो वे भी जानते हैं कि चुनाव से पहले सरकार इन सड़कों को ठीक कर एक बार फिर वोटर को ठगने का जतन करेगी। चुनाव के समय किसानों को भरपूर बिजली देने के लिए बिजली की खरीदी भी होगी, इसके बाद फिर पांच साल तक किसान खाद, बीज, पानी और सड़क के लिए तरसेगा। भाजपा के मंत्रियों का बड़बोलापन और प्रदेश में भ्रष्टाचार भी उसके लिए मुसीबत बन सकता है।

कांग्रेस को दूर करनी होगी गुटबाजी
कांग्रेस की हर बैठक में गुटबाजी के कारण झगड़े होते हैं। बड़े नेता कार्यक्रमों और बैठकों से किनारा कर रहे हैं। इससे कांग्रेस में कलह साफ दिख रही है। भोपाल में पिछले दिनों प्रदेश प्रभारी बीके हरिप्रसाद की मौजूदगी में हुई महत्वपूर्ण बैठक में वरिष्ठ कांग्रेस नेता नदारद थे। सभी सांसदों और विधायकों ने भी इसमें उपास्थिति दर्ज नहीं कराई। जेल भरो आंदोलन से भी बड़े और दिग्गज नेताओं ने दूरियां बना रखी है। बेटे को केंद्रीय मंत्रिमंडल से बाहर करने के कारण पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुभाष यादव नाराज चल रहे हैं। पूर्व नेता प्रतिपक्ष स्वर्गीय जमुना देवी की गैरमौजूदगी में कांग्रेस के लिए आदिवासी वोट बैंक बरकरार रखने के लिए कड़ी मशक्कत करना पड़ेगी। भूरिया क्षेत्र से निकलकर पहली बार प्रदेश के आदिवासी नेता बनने की कोशिश कर रहे हैं। पार्टी हाईकमान भी उन्हें आदिवासी नेता के रूप में प्रदेश में स्थापित कराना चाहता है, इसमें कितनी सफलता मिलती है यह अगले चुनाव में ही स्पष्ट होगा।


केबी फेक्टर दिखाएगा असर
झाबुआ, धार, बडवानी, खरगोन, खंडवा जैसे महाराष्ट्र-गुजरात से लगे जिलों में उमा भारती की लहर 2003 में दिखाई दी थी, वैसा असर 2008 के चुनावों में नहीं दिखी। ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि कांतिलाल भूरिया के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनने का फायदा भी उनकी पार्टी को मिल सकता है। केबी फेक्टर का असर उन जिलों में देखने को मिल सकता है, जहां उनका अश्छा-खासा प्रभाव है। जमुनादेवी को लेकर सुहानुभूति भी इन सीटों पर दिखाई पड़ सकती है। आदिवासी सीटों पर वैसे ही भाजपा को जैसा समर्थन 2003 में मिला था, वैसा अब नहीं दिखाई दे रहा।

ग्वालियर-चंबल संभाग में सब दमदार
ग्वालियर-चंबल संभाग में भी उत्तरप्रदेश का फेक्टर काम करेगा। बसपा वहां जीती तो इन इलाकों के जिलों में भी अपना असर दिखा सकती है। इस क्षेत्र में फूलसिंह बरैया की पार्टी भी अच्छा-खासा जनाधार रखती है। बसपा से निकाले जाने पर भाजपा ने उन्हें अपनाया लेकिन उन्हें वहां पर्याप्त तवज्जो नहीं मिली। इसलिए उन्होंने पार्टी छोड़ दी। रीवा से मुरैना तक 31 सीटें ऐसी हैं, जहां बसपा ने दमदार उपस्थिति दर्ज कराई है।

दिग्गी गुट का कब्जा
प्रदेश कांग्रेस कमेटी पर पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह गुट का कब्जा है। कांतिलाल भूरिया और दिग्विजय सिंह समर्थकों के कब्जे के कारण दूसरे गुट के नेता और पदाधिकारी वहां सिर्फ बैठकों में ही बुलाने पर हाजिर होते हैं वे भी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए।


कांग्रेस में कलह
कांग्रेस ने विधानसभा में अविश्वास प्रस्ताव और जेल भरो आंदोलन के जरिए अपने इरादे जाहिर स्पष्ट कर दिए हैं। लेकिन कांग्रेस की कथित एकता खंडित हो रही है। बड़े नेताओं की अरुचि की वजह से कार्यकर्ताओं में जोश नहीं है। नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ओर प्रदेश अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया की जोड़ी प्रदेश सरकार की नींद उड़ाए हुए है। इस जोड़ी ने पिछले दो महीने में जो सक्रियता दिखाई और सरकार पर जोरदार हमले किए उससे कांग्रेस में नई जान आ गई है।

विंध्य क्षेत्र में बसपा का दबदबा
उत्तरप्रदेश चुनावों का सीधा असर विंध्य क्षेत्र के जिलों रीवा, सतना, सिंगरौली, त्योंथर में दिखाई देगा। यदि बसपा ने उत्तरप्रदेश में अच्छा प्रदर्शन किया तो वह यहां भी पैर पसार सकती है। इस इलाके में अर्जुन सिंह को हराने वाले समानता दल के प्रदेश प्रमुख का भी दबदबा है। महाराष्ट्र की सीमा से लगे छिंदवाड़ा व आसपास के जिलों में एनसीपी का प्रभाव है। यहां यह पार्टियां भले ही सीटें जीत न पाए, लेकिन बड़ी संख्या में वोट काटने में कामयाब जरूर रहेंगी।

इनकी नहीं हो रही पूछ परख
सुभाष यादव, श्रीनिवास तिवारी, इंद्रजीत पटेल, मुकेश नायक, गुफरान ए आजम, अजीज कुरैशी, सुरेश पचौरी, शोभा ओझा, बालकवि बैरागी, किसन पंत

इन मुद्दों पर है अंडरकरंट
खाद संकट, बिजली, पाला , कुपोषण, सड़क, पानी, घोषणाएं ज्यादा, काम कम

Monday, February 13, 2012

बरगी नहर में सुरंग खोदने वाली मशीन


टनल बोरिंग मशीन जो सुरंग खोदने का काम कर रही है इन दिनों पहाड़ में फंस गए है जिससे बरगी नहर का काम रुक गया है




Friday, October 21, 2011

समय से पहले लड़कियां हो रही हैं जवान, बच्चे उत्तेजित !

यह आक्सीटोसिन का असर है। 11 वीं की पढ़ाई कर रहे शुभम (बदला हुआ नाम) में लड़कियों के गुण आ गए हैं। वो बात-बात पर शर्माता रहता है। लड़कियों टाईप हरकतें करता रहता है। घर वाले तो परेशान हैं ही साथ ही दोस्त और आसपास के लोग भी उसे इन आदतों को लेकर उसे खूब छेड़ते हैं। यह अभिभावकों के लिए सतर्क होने का समय है। किशोर में स्त्री गुणोन्मुखी आदतें परेशानी का सबब बन रही हैं।

क्या है मामला ?
दरअसल, दूध व सब्जियों में ऑक्सीटोसीन की मात्रा बढ़ रही है। यही बढ़ी मात्रा उनमें यौन विसंगतियां पैदा कर रही हैं। लड़कियों का हाल तो और बुरा है। उनकी यौवनावस्था घट रही है। नौ से 11 साल की उम्र में वो 18 की हो जा रही हैं। इसी का कारण है कि स्कूलों में सेक्स क्राइम की घटना बढ़ रही है। कम उम्र के बच्चे भी उत्तेजित हो रहे हैं। कम उम्र के बच्चों में डायबिटिज़ होने का डर भी रहता है।

क्या कहते हैं पर्यावरणविद् ?
चर्चित पर्यावरणविद् डॉ. नितीश प्रियदर्शी ने भास्कर डॉट कॉम को बताया कि इन कारणों के पीछे ऑक्सीटोसीन युक्त दूध बड़ा कारण है। इसका इंजेक्शन स्वास्थ्य और पर्यावरण को चुनौती दे रहा है। ग्वाले इस इंजेक्शन का उपयोग मवेशियों को देते हैं। फलतः में दुग्ध ग्रंथियां उत्तेजित होती हैं और नियमित इंजेक्शन से दूध में ऑक्सीटोसीन की मात्रा बढ़ जाती है। वहीँ, किसान भी अधिक लाभ कमाने के लिए पौधों में इसका उपयोग करते हैं। इससे सब्जियां भी शरीर में नए चीजों को लाने में मददगार साबित हो रही हैं।

क्या कहते हैं डॉक्टर ?
डॉ. कारण अपूर्व कि मानें तो ऑक्सीटोसीन एक सेक्स हारमोन है। यह दुग्ध ग्रंथियों, यौन ग्रंथियों तथा गर्भाशय पर असर करता है। ऑक्सीटोसीन युक्त दूध पीकर कम उम्र के लड़के-लड़कियां प्रभावित हो रहे हैं। इससे यौन विकास समय से पहले होने लगता है। इतना ही नहीं लड़कों में स्त्रीय गुण भी आने लगते हैं। इसके अधिक सेवन से हारमोन अनियंत्रित हो जाता है।

क्या है ऑक्सीटोसीन ?
ऑक्सीटोसीन एक प्रोटीनयुक्त हारमोन होता है। गाय व भैंसों में दुग्ध ग्रंथियों को उत्तेजित करने के लिए आपात स्थिति में पशु चिकित्सक इसका इस्तेमाल करते हैं। पर आजकल पशुपालक इस इंजेक्शन का नियमित रूप से व्यवहार करने लगे हैं। इसी का गंभीर परिणाम पशुओं व ऑक्सीटोसीन युक्त दूध पीने वालों को भुगतना पड़ रहा है। इसी से हारमोन संबंधी बीमारियां बढ़ रही हैं।
(sabhar bhaskar)

Saturday, October 15, 2011

यूपीए सरकार देश के संघीय ढांचे को ध्वस्त करने में तुलीः आणवाणी

सर्किट हाउस में पत्रकार बार्ता के दौरान लालकृष्ण आडवाणी,
मुख्यमंत्री  शिवराज सिंह चौहान,  प्रदेशाध्यक्ष  प्रभात झा
जनचेतना यात्रा के साथ यहां पहुंचे भाजपा के शिखर नेता लालकृष्ण आडवाणी ने परिवारवाद को  लोकतंत्र का सबसे बड़ा दुश्मन बताते हुए कहा कि भाजपा में प्रधानमंत्री पद का फैसला संसदीय दल द्वारा लोकतांत्रिक तरीके  से होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे पीएम की रेस में नहीं हैं। शुक्रवार को सतना के सर्किट हाउस में श्री आडवाणी ने पत्रकार वार्ता में कहा कि कांग्रेस में पद परिवार व वंशवाद के आधार पर दिये जाते हैं। देश में भाजपा और कम्युनिस्ट ऐसी दो पार्टियां हैं जहां परिवारवाद के लिये कोई गुंजाइश नहीं है।
श्री आडवाणी ने यूपीए सरकार पर प्रदेश सरकारों के प्रति भेदभाव बरतने के तीखे आरोप लगाते हुए कहा कि वे संघीय ढांचे को ध्वस्त करने में लगे हैं। एनडीए के छः साल के कार्यकाल में कभी ऐसा नहीं हुआ। श्री आडवाणी ने कहा कि एनडीए के शासनकाल में एक प्रदेश के विपक्षी पार्टी के मुख्यमंत्री का यह कहना कि ‘उन्हें कभी ऐसा नहीं लगा कि केन्द्र सरकार ने उनके साथ न्याय नहीं किया। एनडीए के समय कभी कोई भेदभाव नहीं हुआ’ वाजपेयी सरकार के लिये बड़ा सर्टिफिकेट है।
भारत के संवैधानिक ढांचे की विशेषता बताते हुए उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश में उन्हें इस बात का गर्व है कि यहां की सरकार प्रमाणिकता और सार्थकता के साथ गरीब कल्याण के कार्यक्रम लागू कर रही है। लेकिन जब एसी सरकार के साथ केन्द्र की सरकार भेदभाव करती है तो दुःख होता है।
यूपीए करती है भेदभाव
श्री आडवाणी ने कहा कि इस समय जब सा देश में भ्रष्टाचार का माहौल है वहां मध्यप्रदेश की सरकार ने भ्रष्टाचारियों की संपत्ति राजसात करने का कानून बनाया। वह कानून बनने के बाद भी केन्द्र में पड़ा रहेगा। उन्होंने  कहा कि यहां के तीन कानून है जिन्हें केन्द्र द्वारा पास नहीं किया जा रहा है। भेदभाव को और स्पष्ट करते हुए कहा कि मकोका को एमपी और गुजरात सरकार के लिये पास नहीं करती जबकि यह महाराष्ट्र का अक्षरशः है। यह मध्यप्रदेश सरकार के साथ स्पष्ट भेदभाव है। श्री आडवाणी ने केन्द्र पर हमला जारी रखते हुए कहा कि केन्द्र सरकार खाद कोयले की आपूर्ति पूरा नहीं होने देती है। यह हल्की चीजें नहीं है। यह संविधान के नजरिये से भी सीरियस मैटर है।
न्यायपालिका और लोकपाल की व्यवस्था अलग हो
श्री आडवाणी ने लोकपाल के दायरे में न्यायपालिका और प्रधानमंत्री को शामिल करने के मुद्दे पर कहा कि न्यायपालिका की व्यवस्था अलग होनी चाहिये और लोकपाल की व्यवस्था अलग होनी चाहिये। केन्द्र सरकार ने जो किया है उसमें प्रधानमंत्री को लोकपाल की व्यवस्था में नहीं रखा है, जबकि हमने राष्ट्रीय सुरक्षा को अपवाद में रखते हुए लोकपाल के दायरे में प्रधानमंत्री को रखा था। टीम अन्ना से इस मसले पर अपनी चर्चा का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि 2 घंटे की चर्चा में अन्ना और उनकी टीम सभी विषयों पर एक मत थी। आज क्यों उनका मत दूसरा हो गया है नहीं जानता।
अटल जी सर्वश्रेष्ठ
पार्टी में अटल जी की सक्रियता नहीं होने के संबंध में उन्होंने कहा कि अटल जी सर्वश्रेष्ठ व सर्वमान्य नेता रहे हैं। उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं है। उन्हें राज्यसभा में लाने की बहुत कोशिश की लेकिन उनका कहना था कि इस अवस्था में वे अपने कर्तव्य से न्याय नहीं कर पाएंगे।
लोकायुक्त मामले पर गंभीर
ल¨कायुक्त क¨ पूरी गंभीरता से लिया जा रहा है और कर्नाटक में कार्यवाही भी की है। सीएम को ऐसे मामलों में सख्ती बरतनी चाहिये। यह बातें उन्होंने मध्यप्रदेश में कई मंत्रियों के मामले लोकायुक्त में होने के बाद भ्रष्टाचार के दोहरे मापदण्डों पर कहीं। हालांकि इस दौरान प्रदेशाध्यक्ष प्रभात झा ने बताया कि मध्यप्रदेश में मंत्रियों के संबंध में एसी कोई लोकायुक्त रिपोर्ट नहीं हैं।

Friday, September 30, 2011

अकबर, रीवा और जोधाबाई

यह सभी जानते हैं कि महान मुगल शासक अकबर अनपढ़ था लेकिन कम ही लोग जानते होंगे कि अकबर का बचपन मध्यप्रदेश के रीवा जिले के मुकुन्दपुर नामक स्थान में गुजरा था। हालांकि लोग कहते हैं कि अकबर द्वितीय का बचपन यहां गुजरा था लेकिन चल रहे नये शोध से यह सामने आ रहा है कि अकबर द्वितीय नहीं मुकुन्दपुर में जलालुद्दीन अकबर का ही बचपन बीता था। यहां उसे सुरक्षा की दृष्टि से छिपा कर रखा गया था इसलिये उसकी पढ़ाई लिखाई नहीं हो पाई थी। इस दौरान तब के राजकुमार रामसिंह भी उनके साथ कभी-कभी अपना समय व्यतीत करते थे। रीवा राज्य के शासक महाराजा रामचन्द्र जी हुआ करते थे।
नीचे देखे विकीपीडिया के कुछ अंश
हुमायुं को पश्तून नेता शेरशाह सूरी के कारण फारस में अज्ञातवास बिताना पड़ रहा था। [22] किन्तु अकबर को वह अपने संग नहीं ले गया वरन रीवां(वर्तमान मध्य प्रदेश) के राज्य के एक ग्राम मुकुंदपुर में छोड़ दिया था। अकबर की वहां के राजकुमार राम सिंह प्रथम से, जो आगे चलकर रीवां का राजा बना, के संग गहरी मित्रता हो गयी थी। ये एक साथ ही पले और बढ़े और आजीवन मित्र रहे। कालांतर में अकबर सफ़ावी साम्राज्य (वर्तमान अफ़गानिस्तान का भाग) में अपने एक चाचा मिर्ज़ा अस्कारी के यहां रहने लगा
Humayun had been driven into exile in Persia by the Pashtun leader Sher Shah Suri. Akbar did not go to Persia with his parents but grew up in the village of Mukundpur in Rewa(see link:- http://emperors-shirshak.blogspot.com/2011/02/akbar-great.html)

यह लिंक भी देखे- http://indicaspecies.blogspot.com/2008/02/akbar-and-cultural-synthesis.html


अकबर का हिन्दुओं व हिन्दु धर्म के प्रति झुकाव की भी यही वजह रही कि उसका बचपन का लालन पालन मूल रूप से हिन्दुओं के बीच ही हुआ और उसे इनके बीच ही बचपना गुजारना पड़ा।
अब बात आती है अकबर को जोधाबाई कैसे पसंद आई। हालांकि इस पर शोध चल रहा है लेकिन जो बात प्रारंभिक तौर पर सामने आ रही है उसके अनुसार अकबर यहां भी जंगली क्षेत्र (तत्कालीन) मुकुन्दपुर में ही नहीं रहा बल्कि रीवा राजघराने के सदस्यों के साथ उसका आना जाना होता था। तभी कभी वह किसी आयोजन में राजस्थान राजघराने में गया होगा और तब उसे जोधाबाई मिली थी वहीं यादे बाद में अकबर के जिंदगी का फैसला बनी(हालांकि अभी यह प्रमाणिक नहीं है) लेकिन इतिहास शोधार्थी इस पर शोध कर रहे हैं।

रीवा राजघराने को कटार की पात्रता
शोध कह रहे हैं अकबर के दरबार में किसी को भी कटार ले जाने की अनुमति नहीं थी लेकिन रीवा राज घराने में गुजरे बचपन की वजह से रीवा राजघराने को अकबर के दरबार में कटार की अनुमति थी।(शोध जारी है)


इसे विस्तार करने मैटर आमंत्रित हैं- कमेंट में दें

Thursday, September 29, 2011

सिद्धपीठ मैहर देवी शारदा शक्तिपीठ | Siddha Peeth Maihar Devi (Maa Sharda Shakti Peeth)


Siddha Peeth Maihar
उतर-प्रदेश में जितना महत्व मां विध्यावसिनी का है. उतना ही मध्य प्रदेश में मां मैहर देवी का है. आधाशक्ति मां दुर्गा के विभिन्न रुपों में मां शारदा भी है. बोलचाल की भाषा में इन्हें मइहर देवी के नाम से जाना जाता है. जबकि मइहर या मैहर उस स्थान का नाम है. जहां मां शारदा का धाम है. विद्वज्जन कहते है कि यहां सती के दाहिने स्तन का पतन हुआ था. यहां की शक्ति शिवानी और भैरव  को यहां चण्ड कहा जाता है. कुछ विद्वान कहते है, इ सती के दाहिने स्तन का निपात रामगिरि में हुआ था. रामगिरि स्थान चित्रकूट में है. 
मध्यप्रदेश के सतना से 38 किलोमीटर दूर मैहर है. जो एक छोटा सा कस्बा है, किन्तु मां की ख्याती ने इसे पूरे देश में प्रसिद्ध कर दिया है. मां शारदा का धाम मैहर से लगभग 5 किलोमीटर दूर स्थित है. 

पर्वतमालाओं की गोलाकार पहाडी के मध्य 587 फुट की ऊंचाई पर स्थित मां शारदा का एतिहासिक मंदिर 108 शक्तिपीठों में से एक है. यह पीठ सतयुग के प्रमुख अवतार नृ्सिंह के नाम पर नरसिंह पीठ के नाम से भी जाना जाता है. यहां की शक्तिपीठ में लगभग 1500 वर्ष पुरानी नरसिंह की प्रतिमा आज भी विराजती है. 

मां का यह मंदिर कितना पुराना है, इसका कोई सही प्रमाण उपलब्ध नहीं है. परन्तु इस मंदिर में प्रतिमा की स्थापना 502 में नुपुलदेव के करायी थी. ऎसा उल्लेख मंदिर में 10वीं शताब्दी के दो शिलालेखों में है, तो मंदिर के निर्माण की गाथा के आधार स्तंभ है. प्रवेश द्वार से मंदिर तक पहुंचने के लिये छोटी-छोटी लगभग 1000 सीढियां चढनी पडती है. जिनपर टीन के शैड लगे हे. ताकि यात्रियों को धूप-बारिश न लगें. पहाड को गोलाई में काट कर सडक भी बनाई गयी है. जो मंदिर के ठीक नीचे तक जाती है, फिर इसके बाद लगभग 200 सीढियां चढनी होती है. अशक्तों व वृ्द्धों को पहुंचाने के लिये डोली की भी व्यवस्था हे. 
किवदंती के अनुसार राजा परमाल तथा पृ्थ्वीराज चौहान के युद्ध में राजा परमाल की पराजय से क्रुद्ध होकर आल्हा ने पृ्थ्वीराज की सेना समूल नष्ट करने हेतू तलवार खींच ली थी. पर उसकी आराध्या शारदा ने उसका हाथ पकड लिया. जंगल में आल्हा तथा ऊदल अखाडा है. यहां एक ताल भी है. ताल का पानी कभी नहीं घटता है. किवंदती है कि आज भी प्रतिदिन आल्हा मां शारदा को पुष्पांजलि देने आते है.  
यह भी कहा जाता है कि आल्हा-ऊदल तथा धानू आदि भक्तों ने युद्ध में विजय की कामना से इस पहाडी पर शारदा देवी की प्रतिमा स्थापित की तथा देवी को प्रसन्न करने एक लिये आल्हा ने अपने पुत्र इन्दल की बलि  भी दी थी. तथा आज भी आल्हा -ऊदल मंदिर बन्द होने के बाद मंदिर में माता का दर्शन करने के लिये आते है. 
प्रतिवर्ष दोनों नवरात्रों में देश के कोने-कोने से भक्त यहां आते है.

Tuesday, September 27, 2011

सतना जिले में लाखों का चावल घोटाला

 जिले में मध्यान्ह भोजन के नाम पर लीड समितियों द्वारा लाखों का चावल घोटाला किया जा रहा है। इसके तहत मध्यान्ह भोजन के लिये आने वाले ए ग्रेड के चावल को बीपीएल के मोटे चावल से बदल कर कोटे दारों को दिया जा रहा है और यहां से यही घटिया मोटा चावल स्व सहायता समूहों के माध्यम से स्कूलों के बच्चों को खाने के लिये मिलता है। मजे की बात है कि इसके लिये जिला प्रशासन के पास निगरानी का पर्याप्त अमला है लेकिन वह भी अनदेखी कर रहा है। हालात तो यह है कि जिले के कई वरिष्ठ अधिकारी भी इस बात से अनभिज्ञ है कि एमडीएम और बीपीएल का चावल अलग-अलग क्वालिटी का होता है। इस मामले का खुलासा मनकहरी लीड समिति द्वारा दर्जन भर राशन दुकानों में एमडीएम और बीपीएल के लिये एक ही सप्लाई से हुआ है।
क्या है मामला
मध्यान्ह भोजन का चावल नि:शुल्क केन्द्र सरकार द्वारा दिया जाता है यह ए ग्रेड का चावल होता है जबकि बीपीएल का चावल नागरिक आपूर्ति निगम द्वारा स्थानीय स्तर पर खरीदी गई धान की मिलिंग के बाद दिया जाता है यह मोटा होता है। मनकहरी लीड समिति द्वारा कृष्णग़, जमुनिया, खटखरी, कोनिया कोठार सहित दर्जन भर राशन दुकानों में एमडीएम और बीपीएल का चावल एक ही प्रकार का बांटा गया है। यह चावल बीपीएल कोटे का मोटा चावल है। जबकि नान से एमडीएम के लिये अलग चावल भेजा गया था और बीपीएल के लिये अलग चावल भेजा गया था। कोटेदारों की माने तो समिति प्रभारी द्वारा यह कोई नई घटना नहीं है बल्कि ऐसा सालों से चल रहा है। इसकी शिकायत भी की गई है लेकिन न तो कोई जांच हुई न ही कार्यवाही।
कहां गया चावल
इस मामले में कोनिया कोठार के कोटेदार महेश सिंह जो कि जमुनिया और खटखरी की राशन दुकाने भी देखते हैं से बात की गई तो इन्होंने स्वीकार किया कि इस बार लीड समिति ने 27 अगस्त के आसपास सप्लाई की है और इनके द्वारा एमडीएम और बीपीएल के लिये एक ही चावल भेजा गया है। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि यह कोई पहली घटना नहीं है बल्कि ऐसा कई सालों से हो रहा है। उन्होंने बताया कि जो चावल उनके यहां आया है वह बीपीएल कोटे का मोटा चावल है जबकि एमडीएम का ए ग्रेड का चावल काफी बेहतर व पतला होता है वह नहीं दिया गया। उधर नागरिक आपूर्ति निगम के अधिकारियों की माने तो लीड समिति के लिये जुलाई में डिलेवरी आर्डर दिया गया था और 2 और तीन अगस्त को माध्यमिक और प्राथमिक विधालयों के मध्यान्ह भोजन के लिये आपूर्ति की गई थी। यहां सवाल यह खड़ा हो रहा है कि जब तीन अगस्त को एमडीएम का नान गोदाम से उठाव हुआ तो फिर 27 अगस्त तक यह चावल कहां रहा और फिर कोटे में यह चावल न पहुंच कर घटिया मोटा बीपीएल चावल कैसे पहुंचा।
ये कहते हैं दस्तावेज
नान के दस्तावेजों की माने तो लीड समिति के लिये माध्यमिक विद्यालय के एमडीएम का डिलेवरी आर्डर क्रमांक 14145 जारी किया गया जो 29 जुलाई को जारी हुआ तथा 2 व 3 अगस्त को ट्रक क्रमांक 3631 से 331 बोरी, ट्रक क्रमांक 6326 से 281 बोरी तथा ट्रक क्रमांक 3169 से 106 बोरी का उठाव किया गया। इसी तरह प्राथमिक विद्यालय के लिये डिलेवरी आर्डर क्रमांक 14146 के तहत 3 अगस्त को 273 किवंटल चावल का उठाव किया गया। जबकि कोटों में यह चावल पहुंचा ही नहीं और 27 अगस्त को जो चावल कोटों में पहुंचा वह एमडीएम का ए ग्रेड का न होकर बीपीएल का चावल रहा।
क्या है खेल
लीड समिति और संबंधित कई विभागों द्वारा इसमें लाखों का खेल किया जाता है। इस मामले में आरटीआई एकिटविस्ट उदयभान चतुर्वेदी बताते हैं कि लीड समिति द्वारा नान के गोदाम से एमडीएम का बढ़िया चावल तो उठा लिया जाता है लेकिन इसे कोटे में न देकर बाजार में बेच लिया जाता है वहीं राइस मिलों से मिलीभगत करके वहां से बीपीएल कोटे का मोटा चावल लेकर एमडीएम के लिये सप्लाई कर लिया जाता है। एमडीएम और बीपीएल चावल की कीमतों का जो लाखों का अन्तर होता है उसे लीड समितियां और संबंधित विभागों के लोग आपस में खुर्दबुर्द कर लेते हैं। मजे की बात तो यह है कि लीड समिति मनकहरी द्वारा विगत माहों में गेहूं में 50 फीसदी रेत मिलाने का मामला भी सामने आया था जिसकी जांच अभी भी लंबित हैं और आरोपी पकड़ से बाहर हैं।
क्या कहते हैं राशन विक्रेता
हमें लीड समिति ने एमडीएम और बीपीएल का एक ही चावल भेजा है। ऐसा पहली बार नहीं है बल्कि कई सालों से हो रहा है। इसमें हमारा कोई दोष नहीं है बलिक समिति जो चावल पहुंचाती है वहीं हम देते हैं। प्रशासन चाहे तो इसकी जांच कर ले हमारे यहां ऐसा ही चावल आया है।
महेश सिंह, कोटेदार कोनिया कोठार

नागरिक आपूर्ति निगम का कथन
एमडीएम का चावल केन्द्र सरकार द्वारा नि:शुल्क सप्लाई किया जाता है। यह ए ग्रेड का चावल होता है जो एफसीआई के थ्रू ट्रांजिक्शन किया जाता है। यह पंजाब, उत्तरप्रदेश और छत्तीसग़ से आता है तथा पतला और बेहतर श्रेणी का होता है। जबकि बीपीएल के लिये जिस चावल की सप्लाई होती है वह प्रदेश की धान होती है जो खरीदी जाती है फिर इसे मिलिंग के लिये भेजा जाता है वहां से जो चावल आता है उसे बीपीएल व एएवाई को दिया जाता है। यह अपेक्षाकृत मोटा और एमडीएम से कम क्वालिटी का होता है।
दिनेश मिश्रा, अधिकारी नान
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यह गंभीर मामला है। इसकी जांच कराई जायेगी और जो भी इसके दोषी पाये जायेंगे उन्हें दण्ड दिया जायेगा।
सुखबीर सिंह, कलेक्टर
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