Wednesday, May 4, 2011
Wednesday, March 30, 2011
रामवन के विकास में गुम हो गये हनुमान जी
जिले का प्रसिद्ध धार्मिक स्थल रामवन अब पर्यटन स्थल बनने जा रहा है। यहां अब धार्मिकता कम दिखावा व सौर्दर्यीकरण ज्यादा हो चला है। सेवक के रूप में पहचाने जाने वाले राम भक्त हनुमान की विशाल प्रतिमा की वजह से कभी पहचाने जाने वाले हनुमान जी की आज रामवन विकास के बाद हालात यह हो गये हैं कि वे एक कोने में अकेले खड़े नजर आते हैं। यू तो यहां के स्वयं भू विकास पुरुष श्री कृष्ण माहेश्वरी जो चित्रकूट के नानाजी की तरह अपनी पहचान बनाने के लिये तमाम विकास गाथाएं कह रहे हैं लेकिन उनमें नानाजी के एक भी अंश नहीं हैं। दो पंचायतों की राशि का हक मारकर इनके पैसे से विकास कराकर अपनी वाहवाही बताने वाले कहीं भी पंचायत को इसका श्रेय नहीं देते। जबकि हकीकत यह है कि यह सब कुछ पंचायतों की दयानतदारी या कहें कि पंचायत जनप्रतिनिधियों की नासमझी है कि पंचायत के हिस्से की राशि को रामवन में खर्च किया गया। दूसरी ओर यहां मुख्यमंत्री आने वाले हैं इसके लिये बनी सड़कों पर मुरुम का छिड़काव कर इसे नई सड़क दिखाने का प्रयास किया जा रहा है। एक सवाल यह भी उठ रहा है कि रामवन विकास के लिये जो राशि दी गई है वह जनभागीदारी की है इसमें जनभागीदारी का हिस्सा अभी तक जमा नहीं हुआ और मूल निधि पूरी खर्च हो गई। दूसरी ओर मतहा रिछहरी के मूल ग्रामीण रामवन विकास को महज ढकोसला करार देते हुए कहते हैं कि यहां कुछ लोगों की ऐशगाह बन रही है जिसका यहां की जनता को कोई लाभ नहीं है। कुछ लोगों ने इसे अपने कब्जे में लेने का सफल प्रयास किया जो कामयाब होता दिख रहा है। यहां के अतिथि गृह जो आरामगाह साबित होगी उसकी छत से हनुमान जी का नजारा ले तो अपने आप स्पष्ट हो जायेगा कि हनुमान इस भीड़ में कहीं खो गये हैं।हनुमान के दूसरी ओर सौदर्य का नजारा

मानस संघ ट्रस्ट के काम में जुटा प्रशासनिक अमला

बनी सड़क के उपर मुरुम का छिड़काव कर दिखाई जा रही नई सड़क

इस तरह से रामवन में खर्च हो गये करोड़ो लेकिन कोई कुछ न कहेगा क्योंकि इस विकास गाथा में शामिल है राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के श्री कृष्ण माहेश्वरी। लेकिन माननीय माहेश्वरी जी भूल गये कि वे नानाजी की तरह त्याग व समर्पण कहां से लायेंगे।
Monday, August 23, 2010
जनप्रतिनिधियों का नाकारपन और सिटी डेवलपमेंट प्लान
Wednesday, May 19, 2010
खो रही देश की पहचान 'दिल्ली ब्राण्ड'
चर्चा के दौरान परिचित ने पूछा आज से एक दशक पहले जब तुम कोई वस्तु खरीदने जब बाजार जाते थे तो क्या ख्याल होता था. मैने कहा मतलब मैं नहीं समझा. उन्होंने विस्तार से बताते हुए निष्कर्ष बताया कि तब के बाजार में दो वस्तुएं ही होती थी एक तो ओरिजनल या फिर दिल्ली ब्राण्ड. दिल्ली ब्राण्ड का आशय तब ज्यादातर सस्ती चीजों के लिये होता था.
फिर उन्होंने इसे और गहराई में ले जाकर समझाया कि दिल्ली ब्राण्ड का मतलब सिर्फ डुप्लीकेट से न होकर सस्ती चीजों से भी होता था जो हमारे देश के लघु व कुटीर उद्योगों में तैयार होती थी देशज कंपनियों द्वारा सस्ती दरों पर तैयार करके बाजार में उतारी जाती थी. यदि इलेक्ट्रानिक्स पर ही देखे तो दिल्ली ब्राण्ड का तब अच्छा खासा दबदबा हुआ करता था. लेकिन यह सब भारतीय ही होता था.
लेकिन सरकार की गलत नीतियों से जहां लघु व कुटीर उद्योगों सहित छोटे उद्यमी तो तबाह होते ही जा रहे हैं वहीं चीन का बाजार यहां कब्जा जमा रहा है. जिसका नतीजा है की अब लोग दिल्ली ब्राण्ड भूल चुके है. अब इसकी जगह ले रहा चाइना ब्राण्ड.
यदि दिल्ली ब्राण्ड अब खत्म हो गया तो आप खुद समझें के भारतीय बाजार की क्या दशा होगी.
Saturday, October 3, 2009
करोड़ों की लालच में आस्था से खिलवाड़
चूंकि यह मंदिर काफी उंचाई पर बना है और ग्यारह सौ सीढ़ियों का लंबा सफर तय करके माता के दर्शन प्राप्त होते है. इस सफर को आसान बनाने यहां सड़क मार्ग भी है जिसमें वाहनों द्वारा श्रद्धालुओं को लाया ले जाया जाता है. लेकिन देखा गया कि इससे लगातार पहाड़ी का क्षरण हो रहा था. इस लिये आज से सात-आठ साल पहले जिला प्रशासन ने यहां रोप-वे की योजना तैयार करके राष्ट्रीय स्तर पर निविदा आमंत्रित की. इस निविदा के परीक्षण के लिये तकनीकी टीम सहित रोप वे के जानकारों को शामिल करके परीक्षण समिति बनाई गई. निविदा में कलकत्ता की दामोदर कंस्ट्रक्शन नें भी हिस्सा लिया. परीक्षण समिति द्वारा इस असफल करार दिये जाने के बाद भी अंततः निविदा इस कंपनी को स्वीकृत कर दी गई. तब कंपनी ने लगभग चार करोड़ की लागत से बाई केबल(दो तारों वाला) रोपवे बनाने का प्रस्ताव दिया था. निविदा स्वीकृत उपरांत इस कंपनी ने कई सालों तक काम नहीं किया और अंततः कार्य लागत बढ़ कर 9 करोड़ तक पहुंचा पाने में कंपनी सफल हुई. जिला स्तर के आला अधिकारियों सहित पावरफुल जनप्रतिनिधियों की मिलीभगत से अंततः इस कंपनी ने रोपवे तैयार किया वह बाई केबल न होकर मोनो केबल(एक तार वाला) था. इस तरह एक तार का पूरा खर्चा बचा कर कंपनी ने जहां निविदा शर्तों का उल्लंघन तो किया ही वहीं करोड़ो रुपये का सीधा लाभ भी बचा लिया.
यहां तक तो बात चल भी जाती लेकिन सबसे महत्वपूर्ण मामला यह है कि निविदा में रोप-वे के सुरक्षा इंतजामों के मद्देनजर जिन छः सुरक्षा सर्टिफिकेट कंपनी को प्राप्त करने थे कंपनी ने वह भी प्राप्त नहीं किये और रोप-वे प्रारंभ कर दिया. जहां लाखो श्रद्धालु पहुंचते है वहां सुरक्षा मानको से इस तरह का खिलवाड़ प्रशासन व सरकार की जानकारी में आने के बाद भी कोई कदम न उठाया जाना कई सवाल खड़े कर रहा है. इस मामले में जिले का आला अधिकारी जहां चुप्पी साधे हुए हैं वहीं जनप्रतिनिधि भी खामोश है. इससे इस करोड़ों के खेल लंबे वारे न्यारे की बू आ रही है.
वहीं दूसरी ओर परीक्षण समिति से शुरुआती दौर से जुड़े लोगों की माने तो वे खुल कर इस मामले में करोड़ो के घोटाले की बात कह रहे है साथ ही यह भी स्पष्टतौर पर स्वीकार कर रहे है कि यह रोप-वे सुरक्षा मानदण्डों पर खरा नहीं है.
Sunday, September 27, 2009
युक्तियुक्तकरण का मसला
प्रदेश में शैक्षणिक व्यवस्था में तमाम कमियों की मूल वजह शिक्षकों की कमी है लेकिन यह कमी जिला स्तर से देखी जाये तो उतनी समझ में नहीं आती लेकिन शालावार इसमें व्यापक खामियां है. दरअसल जिले में छात्रअनुपात में शिक्षकों की पदस्थापना न होना सबसे बड़ी समस्या है. जहां 50 छात्र हैं वहां भी 5 शिक्षक हैं और जहां 400 छात्र हैं वहां भी 5 शिक्षक. इस समस्या को दूर करने शासन की युक्तयुक्तकरण की व्यवस्था तो है लेकिन इसका पालन नहीं हो रहा या फिर प्रभावी ढंग से नहीं हो रहा है. मैं रीवा संभाग में शिक्षा विभाग की रिपोर्टिंग करता हूं और मैने पाया है कि यदि युक्तियुक्त करण प्रभावी ढंग से हो जाये तो 75 फीसदी शैक्षणिक व्यवस्था ढर्रे पर आ जायेगी. लेकिन शिक्षा महकमें के अधिकारियों से बातचीत में यह भी खुलासा हुआ है कि युक्तियुक्तकरण की व्यवस्था जो अभी है वह काफी खामियो को जन्म देती है और प्रभावशाली लोग इससे बच जाते है. इसलिये युक्तियुक्तकरण राजधानी स्तर पर संचालनालय द्वारा किया जाय. इसके लिये जिलों से शालावार छात्र संख्या व शिक्षक संख्या मंगा कर राजधानी से ही युक्तियुक्तकरण किया जाये.
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