Tuesday, August 28, 2007
60 मिनट के विश्व रिकार्ड का दावा
जलयोग आचार्य लक्ष्मी यादव ने पानी में शरीर के किसी अंग को हिलाए बगैर सीधे 90 डिग्री के कोण में बिना हिले डुले विश्व में सर्वाधिक समय तक खड़े रहने का दावा किया है. विस्तृत देखें http://www.jalyog.blogspot.com/
Friday, August 3, 2007
जिस्मः एडल्ट न्यूज शो या कुछ और ...
Wednesday, August 1, 2007
पीपल के पत्ते से मोबाइल करें रीचार्ज !
पीपल के पत्ते से मोबाइल की बैटरी रीचार्ज करने का तरीका बेहद आसान है. इसके लिये एक ताजा हरा पीपल का पत्ता लीजीए. दूसरी ओर अपने मोबाईल के पिछले हिस्से को खोलकर बैटरी बाहर निकाल लें. फिर पीपल के पत्ते का अगला सिरा (वह नहीं जिससे वह डाल से जुड़ता है) मोबाइल को बैटरी से जोड़ने वाले तीन पिन प्वाइंटों में से बीच वाले में छुला दे फिर पत्ते को लगाए हुए ही बैटरी को कनेक्ट कर दें. इस दौरान जो चक्र बनेगा उसमें मोबाइल और बैटरी तीन जोड़ने वाले पिन प्वाइंट आपस में जुडे तो रहेंगे लेकिन बीच वाले में पीपल के पत्ते की नोक भी बीच में होगी. फिर मोबाइल चालू करने पर आप पाएंगे कि मोबाइल की बैटरी कुछ ही पलों में चार्ज हो चुकी होगी या होने लगी होगी.
तो जनाब जब आप जंगल या ऐसी जगह है जहां बिजली न हो या चार्जर न हो तो बस एक अदद पीपल का पत्ता ढूढ़िये . आप का मोबाइल चार्ज हो जाएगा.
इस प्रयोग की शुरुआत जिले में म.प्र. -उ.प्र. सीमा के बीच स्थित चित्रकूट क्षेत्र से हुई. हालांकि अभी इस प्रयोग वनस्पति शास्त्री और रसायन शास्त्री दोनों हैरान है लेकिन इससे इनकार भी नहीं कर रहे. उनका मानना है कि यह वैज्ञानिक खोज का विषय है.
अब आप भी यह प्रयोग करें. मेरी कामना है आपको कामयाबी मिलेगी.
Monday, July 30, 2007
'आह' के लिये नहीं बारात लेकर आए थे राजकपूर
'आह' फिल्म में तांगे की सवारी कर सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेता स्व. राजकपूर को सतना से रीवा जाते बहुत लोगों ने देखा होगा पर यह जानने वाले कम लोग ही होंगे कि राजकपूर आह फिल्म के लिये कभी सतना आए ही नहीं . वे आए जरूर थे लेकिन शूटिंग के लिये नहीं बल्कि अपनी शादी में बारात लेकर. इसका गवाह स्वयं वह तांगे वाला मधुसूदन लोनिया है जिसने 69 साल पहले उन्हें सतना से रीवा तक पहुंचाया था.राजकपूर को तांगे में बैठाकर ले जाने वाले ९७ वर्षीय मधुसूजन तब की (सन् 1938) की बातें याद करके रोमांचित हो उठते हैं. वे बताते हैं कि उस दिन सतना रेलवे स्टेशन में काफी रंगीनियत थी. हर तांगे वाले की निगाहें स्टेशन की ओर लगीं थी . जैसे ही भाप का गुबार छोड़ते हुए ट्रेन रुकी और उससे मशहूर फिल्मी हस्तियां उतरीं तो हर तांगे वाला उन्हें अपने तांगें में बैठाने को लालायित था. मधुसूदन ने बताया कि यह मेरा सौभाग्य ही रहा कि राजकपूर थोड़ी देर खड़े रहने के बाद सीधे मेरे तांगे तक आए .वहीं से उन्होंने वैजयंतीमाला और जीवन को भी अपने पास बुला लिया.
अचानक पहलू बदलते हुए मधुसूदन ने बताया कि पहले तो तांगे ही आवागमन का सहारा थे . हर दिशा में हर दूरी के लिये तांगें ही साधन थे लेकिन अब तो भूखों मरने की नौबत आ गई है. फिर उसने तुरंत कहा उस दिन सुबह के 8 बजे के लगभग ट्रेन पहुंची थी. उसमें से उतरने वाली मशहूर हस्तियों में राजकपूर सहित वैजयंतीमाला, दिलीप कुमार, ओम प्रकाश, जीवन, कुक्कू, सुरैया को मिला कर कुल 25 से 30 लोग रहे. सभी के सामान तांगों में रखने के बाद बिना देर किये पूरा काफिला रीवा की ओर चल पड़ा. रास्ते भर बाराती चुहलबाजी के साथ फिल्मी दुनिया की बाते सुन का रोमांचित होता मधुसूदन 12 बजे के लगभग 52 किलोमीटर की दूरी तय करके सतना रीवा पहुंचा . उसकी माने तो उस दिन रीवा के उपरहटी में उत्सव का माहौल था और मछरिया दरवाजा के पास बारात रुकी थी. किसके यहां यह तो वह नहीं बता पाया लेकिन यह जरूर कहा कि किसी पुलिस अफसर के यहां थी शादी. उत्साह के साथ उसने यह जरूर बताया कि किराए के 4 रुपये 50 पैसे होते थे लेकिन राजकपूर जी ने 10 रुपए दिये थे. मधुसूदन ने वह तांगा आज भी संभाल कर रखा हुआ है.
Wednesday, July 25, 2007
मीडिया और रामू का गधा
बस आव देखा न ताव एक मीडिया वाले ने गधे सहित रामू को बैठा लिया स्टूडियो में .कुछ देर बाद गधा व मीडिया एक्सपर्ट भी आन लाइन जुड़ गए.
एंकर ने कहा देखिय यह गधा है और विशुद्ध तौर पर गधा है. ये तो इसकी किसी पीढ़ी ने स्कूल का मुंह नहीं देखा. इसके और इसके मालिक के भी बाप दादा नहीं जानते कि अंग्रेजी क्या है. लेकिन यह अंग्रेजी में रेंक रहा है. इ सके मोहल्ले वालों की माने तो यह आज से पहले ऐसे कभी नहीं रेंका. हमारे साथ एक दर्शक जुड़ रहे हैं कलुआप्रसाद . आइए देखते हैं क्या कहते हैं कलुआ जी.
एंकरः हां कलुआ जी क्या कहना चाहते हैं आप.
कलुआः वो क्या है कि इस गधे के बारे में देखने पर तो नहीं लगता हे कि ये अंग्रेजी बोलता होगा लेकिन
एंकरः हमारे पास समय कम है
कलुआः आप कह रहे हैंतो मान लेते हैं . इससे पूछिये जरा कि अपने बाप का नाम अंग्रेजी में बोल लेता है.
एंकर - हम आप से बाद में बात करेंगे और आप को बता देना चाहते हैं कि यह गधा अंग्रेजी में ही बोल रहा है और इतनी कठिन अंग्रेजी बोल रहा है कि न हमें समझ में आ रही है और न आपको लेकिन यह अंग्रेजी बोल रहा है.
.
.
.
तभी रामू और उसका गधा दूसरे चैनल पर दूसरे दिन दिखा . वहां बताया जा रहा था यह जो आप देक रहे हैं यह गधा ही है यह रेंकता नहीं है . हमने इससे भार उठवा कर भी देखा लेकिन इसने उफ तक नहीं की जिससे साबित होता है कि यह गधा है इसमें कोई शक्ति नहीं है यह अन्य गधों की तरह ही रेंकता हैं
तभी गधे ने रेंक दिया और एंकर चिल्लाने लगा...
देखिये यह एक्सक्लूसिव सिर्फ हमारे पास है कि गधा रेंक रहा है और अंग्रेजी में नहीं रेंक रहा है. ... ... ...
इधर दर्शक सोच में है कि मीडिया को गधे से सरोकार है लेकिन जनहित व उसकी समस्याओं से नहीं . यही है मीडिया की हकीकत .
मीडिया का बाजार
आज चारों ओर पत्रकारिता पर बहस हो रही है लेकिन मेरी नजर में बहस बाजार पर होनी चाहिये . आज पत्रकारिता एक बाजार बन गई है या कह सकते हैं बाजार पत्रकारिता में प्रतिबिंबित होने लगा है. चाहे न्यूज चैनल हों या फिर प्रिंट मीडिया सभी बाजार से संचालित हो रहे हैं. सभी बाजार का एक हिस्सा बन गए है. मांग और पूर्ति का नियम यहां भी लागू है. जो बिक रहा होता है दुकानदार उसे ही अपने शोकेस में स्थान देता है ठीक यही स्थितियां मीडिया के सामने हैं . टीआरपी और सर्कुलेशन की लड़ाई में कई बार पत्रकारिता के मानदंड तारतार हो रहे है.
कुछ दिनों पहले दिलीप मंडल जी ने कहा है कि अगर नंदीग्राम में टीवी कैमरा नहीं होता, तो सीपीएम को शायद इतनी शर्म न आ रही होती।मैं भी उनकी बात से सहमत हूं लेकिन कितनी बार यही कैमरा आमजनमानस के साथ पत्रकारिता को भी शर्मशार करता है. कुछ दिन पहले ही एक युवती का नग्न होकर सड़क पर निकल पड़ना और उसका बार-बार न्यूज चैनलों में प्रदर्शन क्या साबित करता है. उसकी आवाज उठाएं यह गलत नहीं है लेकिन नग्नता का प्रदर्शन उचित है क्या? यदि यह प्रश्न उठाया जाये तो लोग कहेंगे कि मीडिया उसकी आवाज उठा रहा था लेकिन मीडिया आवाज के परिप्रेक्ष्य में एक सनसनाहट दिखाकर कुछ और बढ़ा रहा था.
आज की सुर्खियां रेप की घटनाएं बनती है. ऐसा कोई दिन नहीं जिस दिन इन घटनाओं को चासनी में डालकर पेश न किया जाता हो. खोजी पत्रकारिता के नाम पर रेप, भूत-प्रेत, सेक्स और कुछ इस जैसा ही दिखाया जा रहा है. दरअसल सनसनी के चक्कर में जो मिल रहा है उसे ही रंग कर प्रस्तुत करने के आदी होते जा रहे पत्रकार स्वयं पत्रकारिता भूल रहे हैं.
रही बात खोजपरक खबरों की तो यदि वो कारपोरेट जगत की हुई तो उसपर हाई लेबल पर ही सौदे हो जाते है या फिर यदि प्रशानिक स्तर की कोई बड़ी खबर हुई तो वह बेहतर संबंधों के नाम पर तो कई बार पैसों से मैनेज हो जाती है. तो ऐसे में सिर्फ रह जाती है घटना प्रधान खबरें. तो फिर शुरू हो जाती है चासनी लगा कर प्रस्तुतिकरण.
फिर चाहे वह भूतं शरणं गच्छामि हो या फिर सास बहू के झगड़े. कुछ न मिला तो बिपाशा और जॉन का झगड़ा तो मिल ही जाएगा.
आज न तो शिक्षा के मामले में कुछ बोला जा रहा न ही लिखा जा रहा न ही स्वास्थ्य के बारे में . और भी खबरे हैं जो जनहित से सरोकार रखती हैं लेकिन उन्हें कोई स्थान नहीं है. क्योंकि उनसे सर्कुलेशन या टीआरपी नहीं बढ़नी.
दूसरी ओर एक पुलिस वाले की सड़क दुर्घटना में मौत होती है तो वह बड़ी खबर बनती है लेकिन यदि कोई गरीब कुचल जाता है तो छोटा सा स्थान या फिर संक्षिप्त में सिमट जाता है. जहां जिंदगी के ऐसे दोहरे मापदंड हो तो स्वयं ही समझा जा सकता है कि पत्रकारिता की स्थिति क्या है.
हालांकि यह लंबी बहस का मुद्दा है क्योंकि आज पत्रकारिता और बाजार एक दूसरे के पूरक हो गए हैं और बिना एक दूसरे के चल भी नहीं सकते .
कुछ दिनों पहले दिलीप मंडल जी ने कहा है कि अगर नंदीग्राम में टीवी कैमरा नहीं होता, तो सीपीएम को शायद इतनी शर्म न आ रही होती।मैं भी उनकी बात से सहमत हूं लेकिन कितनी बार यही कैमरा आमजनमानस के साथ पत्रकारिता को भी शर्मशार करता है. कुछ दिन पहले ही एक युवती का नग्न होकर सड़क पर निकल पड़ना और उसका बार-बार न्यूज चैनलों में प्रदर्शन क्या साबित करता है. उसकी आवाज उठाएं यह गलत नहीं है लेकिन नग्नता का प्रदर्शन उचित है क्या? यदि यह प्रश्न उठाया जाये तो लोग कहेंगे कि मीडिया उसकी आवाज उठा रहा था लेकिन मीडिया आवाज के परिप्रेक्ष्य में एक सनसनाहट दिखाकर कुछ और बढ़ा रहा था.
आज की सुर्खियां रेप की घटनाएं बनती है. ऐसा कोई दिन नहीं जिस दिन इन घटनाओं को चासनी में डालकर पेश न किया जाता हो. खोजी पत्रकारिता के नाम पर रेप, भूत-प्रेत, सेक्स और कुछ इस जैसा ही दिखाया जा रहा है. दरअसल सनसनी के चक्कर में जो मिल रहा है उसे ही रंग कर प्रस्तुत करने के आदी होते जा रहे पत्रकार स्वयं पत्रकारिता भूल रहे हैं.
रही बात खोजपरक खबरों की तो यदि वो कारपोरेट जगत की हुई तो उसपर हाई लेबल पर ही सौदे हो जाते है या फिर यदि प्रशानिक स्तर की कोई बड़ी खबर हुई तो वह बेहतर संबंधों के नाम पर तो कई बार पैसों से मैनेज हो जाती है. तो ऐसे में सिर्फ रह जाती है घटना प्रधान खबरें. तो फिर शुरू हो जाती है चासनी लगा कर प्रस्तुतिकरण.
फिर चाहे वह भूतं शरणं गच्छामि हो या फिर सास बहू के झगड़े. कुछ न मिला तो बिपाशा और जॉन का झगड़ा तो मिल ही जाएगा.
आज न तो शिक्षा के मामले में कुछ बोला जा रहा न ही लिखा जा रहा न ही स्वास्थ्य के बारे में . और भी खबरे हैं जो जनहित से सरोकार रखती हैं लेकिन उन्हें कोई स्थान नहीं है. क्योंकि उनसे सर्कुलेशन या टीआरपी नहीं बढ़नी.
दूसरी ओर एक पुलिस वाले की सड़क दुर्घटना में मौत होती है तो वह बड़ी खबर बनती है लेकिन यदि कोई गरीब कुचल जाता है तो छोटा सा स्थान या फिर संक्षिप्त में सिमट जाता है. जहां जिंदगी के ऐसे दोहरे मापदंड हो तो स्वयं ही समझा जा सकता है कि पत्रकारिता की स्थिति क्या है.
हालांकि यह लंबी बहस का मुद्दा है क्योंकि आज पत्रकारिता और बाजार एक दूसरे के पूरक हो गए हैं और बिना एक दूसरे के चल भी नहीं सकते .
Friday, July 20, 2007
और वह ईसाई हो गया
.... और वह ईसाई हो गया.
सतना में मिशनरी कार्यकर्ताओं पर हमले के बाद सबकी निगाहें धर्मान्तरण की ओर गईं. सो हम भी पहुंचे माजरा समझने. काफी खोज बीन के बाद पता चला की ये मिशनरी कार्यकर्ता कुछ दिन पहले एक हरिजन बस्ती में गए थे . वहां के खालिस गरीबों को जाकर खाने पीने का सामान देते. फिर कपड़ो की व्यवस्था की. उनके लड़कों को पढ़ाना भी शुरू कर दिया. धीरे - धीरे वे लड़के और उनका परिवार मिशनरियों के आश्रम आना शुरू कर दिया. बातो ही बातों में उन्हें अपनी प्रार्थना में भी शामिल करने लगे और एक दिन पाठ पढ़ाया कि देखों इस देवता को इसी के आदेश से हमें तुम्हारा पता चला और इसी की इच्छा थी कि तुम्हारी मदद हम करें. जब यह ईश्वर तुम्हारा इतना ख्याल रखता है तो तुम क्यों नहीं इसके अनुयायी बन जाते हो? बस फिर क्या था इन गरीबों को क्या चाहिये दो जून की रोटी व कपड़े फिर इनका भगवान कोई भी ... और फिर उसने ईसा का धर्म अपना लिया.
यह तो था मामला धर्मान्तरण का लेकिन इसके पीछे के तथ्य अभी भी विचारणीय है-
1. क्या वह गरीब न होता तो दूसरा धर्म अपनाता.
2. क्या उसके अपने धर्म व समाज वाले मदद नहीं कर सकते थे.
3. सरकारी योजनाएं(सतना में रोजगार गारंटी योजना चलरही है) होने के बाद भी पलायन की स्थिति क्यों बन रही है.
4. आज जो हिन्दू संगठन धर्म बदल लेने पर चिल्ला रहे हैं क्या उन्होंने पहले इस गरीब की ओर ध्यान दिया.
5. अपने व अपने परिवार को सुखमय जीवन जीने के अवसर प्रदान करने के लिये धर्म बदलना गुनाह है?
इसके अलावा भी कई प्रश्न हैं लेकिन उत्तर तो हम सबको ढूढ़ना पड़ेगा. नहीं तो हर दिन कोई अपना धर्म बदलेगा और इन स्थितियों में धर्म बदलना मेरी नजर में गुनाह नहीं है. क्योंकि मिशनरियों की तरह किसी भी हिन्दू संगठन में मदद का यह जज्बा नहीं है. हां यह जरूर है कि साल के किसी एक दिन किसी गरीब को कंबल या सेव फल बांट देते हैं ओर दूसरे दिन विज्ञप्तियों के माध्यम से हर अखबार में छप कर लोगों के सामने आ जाता है जिसे साल भर गाया जाता है. ..
Subscribe to:
Posts (Atom)
