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Wednesday, May 19, 2010

खो रही देश की पहचान 'दिल्ली ब्राण्ड'

बाजार के बारे में मुझे ज्यादा जानकारी या कहूं कि ज्ञान नहीं है लेकिन विगत दिवस मेरे एक परिचित से बातचीत के बाद जो सच सामने आया है वह इतना चौंकाने वाला है कि इसका असर आने वाले समय में इतना बुरा पड़ सकता है कि देश की छवि ही बदल सकती है.
चर्चा के दौरान परिचित ने पूछा आज से एक दशक पहले जब तुम कोई वस्तु खरीदने जब बाजार जाते थे तो क्या ख्याल होता था. मैने कहा मतलब मैं नहीं समझा. उन्होंने विस्तार से बताते हुए निष्कर्ष बताया कि तब के बाजार में दो वस्तुएं ही होती थी एक तो ओरिजनल या फिर दिल्ली ब्राण्ड. दिल्ली ब्राण्ड का आशय तब ज्यादातर सस्ती चीजों के लिये होता था.
फिर उन्होंने इसे और गहराई में ले जाकर समझाया कि दिल्ली ब्राण्ड का मतलब सिर्फ डुप्लीकेट से न होकर सस्ती चीजों से भी होता था जो हमारे देश के लघु व कुटीर उद्योगों में तैयार होती थी देशज कंपनियों द्वारा सस्ती दरों पर तैयार करके बाजार में उतारी जाती थी. यदि इलेक्ट्रानिक्स पर ही देखे तो दिल्ली ब्राण्ड का तब अच्छा खासा दबदबा हुआ करता था. लेकिन यह सब भारतीय ही होता था.
लेकिन सरकार की गलत नीतियों से जहां लघु व कुटीर उद्योगों सहित छोटे उद्यमी तो तबाह होते ही जा रहे हैं वहीं चीन का बाजार यहां कब्जा जमा रहा है. जिसका नतीजा है की अब लोग दिल्ली ब्राण्ड भूल चुके है. अब इसकी जगह ले रहा चाइना ब्राण्ड.
यदि दिल्ली ब्राण्ड अब खत्म हो गया तो आप खुद समझें के भारतीय बाजार की क्या दशा होगी.

Saturday, October 3, 2009

करोड़ों की लालच में आस्था से खिलवाड़

मैहर के त्रिकूट पर्वत पर विराजी माता शारदा का मंदिर देश भर की आस्था का केन्द्र है तथा प्रमुख शक्ति पीठों में गिना जाता है. यहां प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते है. अकेले नवरात्रि के दिनों में देश भर से आने वाले दर्शनार्थियों के संख्या एक दिन में डेढ़ लाख तक पहुंच जाती है.
चूंकि यह मंदिर काफी उंचाई पर बना है और ग्यारह सौ सीढ़ियों का लंबा सफर तय करके माता के दर्शन प्राप्त होते है. इस सफर को आसान बनाने यहां सड़क मार्ग भी है जिसमें वाहनों द्वारा श्रद्धालुओं को लाया ले जाया जाता है. लेकिन देखा गया कि इससे लगातार पहाड़ी का क्षरण हो रहा था. इस लिये आज से सात-आठ साल पहले जिला प्रशासन ने यहां रोप-वे की योजना तैयार करके राष्ट्रीय स्तर पर निविदा आमंत्रित की. इस निविदा के परीक्षण के लिये तकनीकी टीम सहित रोप वे के जानकारों को शामिल करके परीक्षण समिति बनाई गई. निविदा में कलकत्ता की दामोदर कंस्ट्रक्शन नें भी हिस्सा लिया. परीक्षण समिति द्वारा इस असफल करार दिये जाने के बाद भी अंततः निविदा इस कंपनी को स्वीकृत कर दी गई. तब कंपनी ने लगभग चार करोड़ की लागत से बाई केबल(दो तारों वाला) रोपवे बनाने का प्रस्ताव दिया था. निविदा स्वीकृत उपरांत इस कंपनी ने कई सालों तक काम नहीं किया और अंततः कार्य लागत बढ़ कर 9 करोड़ तक पहुंचा पाने में कंपनी सफल हुई. जिला स्तर के आला अधिकारियों सहित पावरफुल जनप्रतिनिधियों की मिलीभगत से अंततः इस कंपनी ने रोपवे तैयार किया वह बाई केबल न होकर मोनो केबल(एक तार वाला) था. इस तरह एक तार का पूरा खर्चा बचा कर कंपनी ने जहां निविदा शर्तों का उल्लंघन तो किया ही वहीं करोड़ो रुपये का सीधा लाभ भी बचा लिया.
यहां तक तो बात चल भी जाती लेकिन सबसे महत्वपूर्ण मामला यह है कि निविदा में रोप-वे के सुरक्षा इंतजामों के मद्देनजर जिन छः सुरक्षा सर्टिफिकेट कंपनी को प्राप्त करने थे कंपनी ने वह भी प्राप्त नहीं किये और रोप-वे प्रारंभ कर दिया. जहां लाखो श्रद्धालु पहुंचते है वहां सुरक्षा मानको से इस तरह का खिलवाड़ प्रशासन व सरकार की जानकारी में आने के बाद भी कोई कदम न उठाया जाना कई सवाल खड़े कर रहा है. इस मामले में जिले का आला अधिकारी जहां चुप्पी साधे हुए हैं वहीं जनप्रतिनिधि भी खामोश है. इससे इस करोड़ों के खेल लंबे वारे न्यारे की बू आ रही है.
वहीं दूसरी ओर परीक्षण समिति से शुरुआती दौर से जुड़े लोगों की माने तो वे खुल कर इस मामले में करोड़ो के घोटाले की बात कह रहे है साथ ही यह भी स्पष्टतौर पर स्वीकार कर रहे है कि यह रोप-वे सुरक्षा मानदण्डों पर खरा नहीं है.

Sunday, September 27, 2009

युक्तियुक्तकरण का मसला

प्रदेश में शैक्षणिक व्यवस्था में तमाम कमियों की मूल वजह शिक्षकों की कमी है लेकिन यह कमी जिला स्तर से देखी जाये तो उतनी समझ में नहीं आती लेकिन शालावार इसमें व्यापक खामियां है. दरअसल जिले में छात्रअनुपात में शिक्षकों की पदस्थापना न होना सबसे बड़ी समस्या है. जहां 50 छात्र हैं वहां भी 5 शिक्षक हैं और जहां 400 छात्र हैं वहां भी 5 शिक्षक. इस समस्या को दूर करने शासन की युक्तयुक्तकरण की व्यवस्था तो है लेकिन इसका पालन नहीं हो रहा या फिर प्रभावी ढंग से नहीं हो रहा है. मैं रीवा संभाग में शिक्षा विभाग की रिपोर्टिंग करता हूं और मैने पाया है कि यदि युक्तियुक्त करण प्रभावी ढंग से हो जाये तो 75 फीसदी शैक्षणिक व्यवस्था ढर्रे पर आ जायेगी. लेकिन शिक्षा महकमें के अधिकारियों से बातचीत में यह भी खुलासा हुआ है कि युक्तियुक्तकरण की व्यवस्था जो अभी है वह काफी खामियो को जन्म देती है और प्रभावशाली लोग इससे बच जाते है. इसलिये युक्तियुक्तकरण राजधानी स्तर पर संचालनालय द्वारा किया जाय. इसके लिये जिलों से शालावार छात्र संख्या व शिक्षक संख्या मंगा कर राजधानी से ही युक्तियुक्तकरण किया जाये.

Saturday, November 1, 2008

कोटला में अधिनियम की उड़ी धज्जियां

फिरोज शाह कोटला स्टेडियम में २९ अक्टूबर को भारत आस्ट्रेलिया के बीच खेले गये क्रिकेट मैच में कानून की जमकर धज्जियां उड़ीं. भारत में सिगरेट एवं अन्य तंबाकू उत्पाद (व्यापार, वाणिज्य, उत्पादन, आपूर्ति एवं वितरण के नियमन और विज्ञापनों पर रोक) अधिनियम 2003 के तहत तंबाकू उत्पाद के विज्ञापनों के सार्वजनिक जगह पर प्रदर्शन पर रोक लगी है बावजूद इसके एक तंबाकू उत्पाद का विज्ञापन प्रदर्शित किया गया. (चित्र देखें) यह चित्र हमें भेजा है IMCFJ के धनन्जय सिंह जी ने.

Sunday, September 28, 2008

हाइवे से लड़की अगवा, भाजपाई बचाव में उतरे

27 सितंबर की रात 10 बजे शहर में खुलेआम एक इण्डिका में सवार में लोगों ने एक लड़की को जबरन उठा लिया. मामला पुलिस तक जैसे पहुंचा और कार्रवाई जैसे ही शुरू हुई उसके थोडी ही देर बाद भाजपा के प्रदेश स्तर के पदाधिकारी अपराधियों को बचाने में जुट गए. हालात यह रहे कि भाजपा के इन
पदाधिकारियों ने देर रात तक पुलिस पर सत्ता का दबाव बना कर मामले को बदलवा तो लिया ही कहानी में लड़की का अपहरण ही हट गया और अपहृत व्यक्ति बदल कर लड़का हो गया.
प्रत्यक्षदर्शियों से प्राप्त जानकारी के अनुसार इण्स्ट्रियल एरिया स्थिति जिला उद्योग संघ के कार्यालय के समीप सतना रीवा राजमार्ग पर रात सवा दस बजे एक युवती अपनी स्कूटी क्रमांक १९ एमबी ८९१९ से गुजर रही थी. तभी एक इण्डिका कार एमपी. १९ जी ८३५३ में सवार कुछ युवा तेजी से स्कूटी के सामने आकर उसे रोक देते है. आनन फानन में उस लड़की को उठाकर उस कार में जबरन लाद लिया जाता है और वाहन तेजी से वहां से गुजर जाता है. मामला यहां तक जब प्रत्यक्षदर्शियों ने देखा तो तुरंत पुलिस को सूचना दी तथा वाहन का नंबर लिखाया. सूचना पर पुलिस भी तुरंत हरकत में आई लेकिन सतना पुलिस की यह तत्परता तब समझ में आई जब कुछ देर बाद मामला ही सुलटाने की कवायद में खुद पुलिस कर्मी भी शामिल नजर आने लगे. दरअसल जबतक पुलिस स्कूटी को अपने में कब्जे में लेकर निकली थी तभी घटनास्थल पर शहर कुछ भाजपाई और गल्ला के कई बड़े व्यापारी पहुंचे. यहां से
जब उन्हें जानकारी मिली की स्कूटी पुलिस के कब्जे में है तो वे बिना समय गंवाए अपने मोबाइलों से संपर्क में जुट गए और आनन फानन में घटना स्थल से बाईपास की ओर चले गए. बताया गया है कि इन्होंने ज्यादा वक्त न गंवाते हुए चेतक मोबाइल से संपर्क किया बाईपास में खड़ी पुलिस की चेतक के पास पहुंच गए. यहां से पुलिस की मोबाइल वाहन यूनिट संग्राम कालोनी पहुंची जहां रात को आमजन से स्कूटी दिखा कर यह पता करने लगी की इस वाहन को चलाने वाली युवती को जानते है. इसके पीछे पुलिस की मंशा युवती का पता पुष्ट करना रही. यहां से एक साजिश(बाईपास में हुई सेटिंग) के तहत पुलिस को यह बताया गया यह स्कूटी किसी लड़के की है. वह लड़का किसी बड़े गल्ला व्यापारी का लड़का है. यहां महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि बाईपास से जनप्रतिनिधियों एवं गल्ला व्यापारी की वह गाड़ी यहां भी चेतक वाहन से साथ-साथ पहुंची हुई थी. इधर कुछ देऱ बाद पता चला कि आरोपी इण्डिका गाड़ी टिकुरिया टोला के पास बरामद कर ली गई है. इसके बाद थाने का घटना क्रम जाना जाय तो यहां भाजपा के वरिष्ट नेता तथा प्रदेश पदाधिकारी अनिल जायसवाल अपने पार्टी के साथियों के साथ मामला मैनेज करने पहुंच चुके थे. सत्ता का दबाव काम आया और पुलिस ने भी जो कहानी बताई वह काफी चौंकाने वाली रही. इस नई कहानी के अनुसार अपहरण लड़की का नहीं किसी लड़के का हुआ दर्शा दिया गया. इस जानकारी के बाद आगे का घटनाक्रम पता करने की फिर हमने जहमत ही नहीं उठाई.
क्यों नहीं थाने पहुंचा चेतक
यहां सबसे महत्वपूर्ण तथ्य तो यह है कि प्रत्यक्षदर्शियों की सूचना पर जब पुलिस का मोबाइल वाहन चेतक लड़की की स्कूटी बरामद कर चुका था तो उसे लेकर वह थाने क्यों नहीं पहुंचा. इसके अलावा वह स्कूटी सहित बाईपास में क्या करने गया था. बाईपास में चेतक स्कूटी सहित खड़ा है इसकी जानकारी उन भाजपा नेताओं और गल्ला व्यापारियों को कैसे पता चली. इस काण्ड में जिसका अपहरण हुआ वह लड़की थी बाद में वह लड़के में कैसे बदल गई. इस जैसे कई सवाल हैं जो अभी भी अनुत्तरित हैं.
सलवार कुर्ता पहने थी लड़की
प्रत्यक्षदर्शियों की माने तो लड़की काली स्कूटी में सवार थी तथा सलवार कुर्ता पहने हुए थी. अंदाज से ज्यादा उम्र की नजर न आने वाली उस युवती ने अपना मुंह सफेद दुपट्टे से ढंक रखा था.

Wednesday, August 20, 2008

2012 में प्रलय होना असंभव

हर चैनल अखबार में इन दिनों यही बात कि 2012 में प्रलय का दिन है. आज तो इण्डिया टीवी वालों ने इसका ऐसा प्रदर्शन किया मानों कि भविष्य में जाकर
सब कुछ देख कर ही आएं है. यहां मैं कहना चाहता हूं कि यह सब बेसिर पैर की बातें हैं. ये सभी अपने तरीके से सिर्फ अपने को हिट कर रहे हैं. न तो इनके द्वारा किसी विषय विशेषज्ञों से बात होती न ही इनके संवाददाता कुछ जानते सिर्फ भ्रम फैला कर अपनी टीआरपी. बढ़ा रहे है. कभी कहेंगे वैज्ञानिकों का ऐसा दावा है या फिर कुछ और लेकिन यह नहीं बताएंगे किस वैज्ञानिक का ऐसा कहना है...
विज्ञान के नजर में पृथ्वी की प्रलय (जीवन का विनाश) सिर्फ सूर्य या उल्कापिंड या फिर सुपर बाल्कैनो (महाज्वालामुखी) ही कर सकते हैं. इसमें भी सुपर बाल्कैनों पृथ्वी से संपूर्ण जीवन का विनाश करने में सक्षम नहीं हैं क्योंकि कितना भी बड़ा ज्वालामुखी होगा वह अधिकतम 70 फीसदी पृथ्वी को ही नुकसान पहुंचा सकता है. रही बात उल्कापिंड की तो अभी तक पृथ्वी के घूर्णन कक्षा या इसके आसपास ऐसी कोई उल्कापिंड अभी तक नहीं दिखी है जो पृथ्वी को प्रलय के मुहाने पर ला दे, न ही अभी दूर-दूर तक ऐसी कोई संभावना है. तीसरा है सूर्य- तो सूर्य जब अपनी चरम अवस्था में पहुंचेगा तभी वह पृथ्वी मे प्रलय ला सकता है. दरअसल सूर्य एक तारा है. हर तारे की मौत तय होती है.
जब यह मरता है तो अपने सारे ग्रहों के साथ मरता है. तारा खत्म होने से पहले लाल दानव तारा या श्वेत बामन तारे में बदलता है. इस प्रक्रिया में उसका द्रव्यमान काफी कम होता जाता है जिससे उसकी प्रचंडता और गुरुत्वाकर्षण में बढ़ोत्तरी होती जाती है. इसके प्रभाव से वह अपने ग्रहों को अपनी ओर खींच कर उन्हें जला देता है फिर स्वयं ब्लैक होल में बदल जाता है. ब्लैक होल इस लिये कहा जाता है क्योंकि इसका गुरुत्वाकर्षण इतना ज्यादा होता है कि अपने पास से गुजरने वाले प्रकाश जिसकी गति तीन लाख किलो मीटर प्रति सेकेण्ड होती है उसे भी अपनी ओर खीच लेता है. इस कारण वहां काला धब्बा ही नजर आता है. लेकिन अभी सूर्य को इस अवस्था में आने में अरबों वर्ष लगेंगे. दूसरी ओर कुछ का कहना है 2012 में सूर्य अपने चरम पर होगा और पृथ्वी झुलस जाएगी. हां यह सही है इस दौरान सूर्य अपने चरम पर होगा. लेकिन यह हर 11 वर्ष में होने वाली सतत प्रक्रिया है. जिसे इलेवन इयर साइकिल के नाम से जाना जाता है. इस दौरान सूर्य में सन स्पाट ज्यादा बनते हैं, सौर आंधिया चलती हैं तथा सौर लपटें ज्यादा बडी बनती है. जिससे सौर विकरण काफी तीव्र गति से बनते है. यहां यह स्पष्ट कर देना चाहूंगा कि सौर लपटें पृथ्वी तक नहीं आ सकती न ही आंधी. हां यहां सौर विकरण का प्रभाव होता है तथा इलेक्ट्रोमैग्नेटिक प्रभाव जरूर असर करता है. वह भी ध्रुवों पर ज्यादा. लेकिन इसके प्रभाव कृत्रिम उपग्रहों, विमानों, अंतरिक्ष यानों तथा यान से बाहर रहने वाले अंतरिक्ष यात्रियों पर पड़ता है.
कास्मिक रे पर काम कर रहे विश्व के तीसरे सबसे बड़े वैज्ञानिक डॉ एस.पी. अग्रवाल ने इन बातों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मानव जीवन पर इसका प्रभाव इतना मात्र होगा कि पक्षी यदा कदा अपना रास्ता बदल देते हैं तथा नगण्य संख्या में हृदय रोगी परेशानी में आ सकते हैं. इसके अलावा मानव जीवन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता. उन्होंने कहा कि यह कहना कि 2012 में पृथ्वी में प्रलय होगी पूर्णतः गलत है. साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि जैसे लोग कहते हैं कि प्रलय में पृथ्वी डूब जाएगी तो वह भी गलत है क्योंकि यदि समुद्र का पूरा पानी तथा आसमान में व्याप्त पूरी वाष्प का पानी तथा पृथ्वी में मौजूद पूरी बर्फ भी यदि पिघल कर पानी बन जाए और पूरी पृथ्वी पर फैले तो वह पूरी धरती से महत ढाई फीट उंचाई तक ही पानी भर सकती है और यह पूरा पानी सत्रह दिन में सतह द्वारा सोख लिया जाएगा.

इस लिये पृथ्वी के प्रलय के डर से दूर होकर मस्त रहें तथा चैनलों व अखबारों की प्रलय भरी बेवकूफियों का आनंद लें. मेरा मानना तो यह है कि इन चैनलों को हकीकत सामने लानी चाहिए अंधविश्वास दूर करना चाहिए न कि जबरन की नाटकीयता द्वारा लोगों में भय भरना चाहिये.

Sunday, August 17, 2008

भाषा, संस्कृति और गांव का दामाद

विकसित राष्ट्र और हिन्दी का विकास में अनुनाद सिंह की टिप्पणी का मैं पूरा सम्मान करता हूं. हो सकता है मैं गलत भी होऊं लेकिन मैं अनुनाद सिंह से पूरी तरह सहमत नहीं हूं.
यह सही है कि लार्ड मैकाले का मानना था कि जब तक संस्कृति और भाषा के स्तर पर गुलाम नहीं बनाया जाएगा, भारतवर्ष को हमेशा के लिए या पूरी तरह, गुलाम बनाना संभव नहीं होगा। लेकिन महोदय यहां आपको गुलाम कौन बना रहा है. दरअसल हम सभी अपनी रोटियां सेंकने के लिये हमेशा एक भय का वातावरण बनाने के आदी हो गए हैं कि फलां हमें गुलाम बना रहा है मैं पूछता हूं कि कौन सा देश भारत को भाषा व संस्कृति के आधार पर गुलाम बनाने की कोशिश कर रहा है. मेरे ख्याल से कोई नहीं .... लेकिन फिर भी हम कहने से नहीं चूक रहे...

दरअसल हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हम हिन्दी भाषा के साक्षर होने की बात करते हैं या हिन्दी की स्वीकार्यता की. हिन्दी साक्षर करने की बात है तो उसे शिक्षा से जोड़ दीजिए लेकिन यदि ससम्मान हिन्दी की स्वीकार्यता की बात करें तो फिर शायद हमें अपने पैरों पर पहले खड़े होना होगा फिर हिन्दी की आवाज उठानी होगी.

रही बात मैकाले की संस्कृति की तो मुझे याद है कि पहले मेरे पिता जी जब अपनी ससुराल जाते थे तो वे पूरे गांव के दामाद होते थे और मैं पूरे गांव का भान्जा लेकिन आज उस घर में ही नई पीढ़ी दामाद को पहचान ले तो बड़ी बात है. क्यों हम अब घर के आंगन को कुंवारा रखते हुए बारात घरों से शादी करते हैं. बाराते दूसरे गांव या शहर न जाकर वधू पक्ष को अपने शहर में बुला लेते हैं क्या इससे हम एक दूसरे के रीति रिवाजों से परिचित हो सकेंगे. दूसरी एक और बात याद आती है कि हमारे पड़ोस की आंटी के यहां मायके से जब अचार आता था तो वे हमें भी देती थी. बदले में जब वह कटोरी वापस की जाती थी तो हमारे घर से भी कुछ न कुछ दिया जाता था. इस लेन देन को आप क्या कहेंगे. समाजिक बंधन या समाज वाद या कुछ और लेकिन आज के बड़े लोग इतनी दूरियां बना चुके हैं कि यदि घर में प्याज खत्म है तो वे पड़ोस से मांगना शर्म की बात कहेंगे. हो सकता है मैं गलत होऊं लेकिन वो अचार और प्याज हमें सामाजिक रूप से जोड़ती है तो गांव का दामाद हमें सांस्कृतिक रूप से मजबूत करता है. लेकिन अब यह दोनो हाशिये पर जा रहे हैं. यह तो महज कुछ उदाहरण है लेकिन हमारे अगल बगल में आज न जाने कितना कुछ बदल चुका है. हमारे बच्चे अब पड़ोसियों के भरोसे नहीं छोड़े जा सकते आखिर यह सब क्या है. हम सिर्फ पाश्चात्य संस्कृति का रोना रोते है लेकिन अपनी विरासत को खुद खोते जा रहे हैं .... इसलिये मेरा मानना है कि भाषा और संस्कृति का दिखावा करने से कुछ नहीं होगा हमें खुद बदलना होगा तथा उन्नत होना होगा तब जाकर कहीं हमें सफलता मिलेगी.