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Wednesday, July 25, 2007

मीडिया का बाजार


आज चारों ओर पत्रकारिता पर बहस हो रही है लेकिन मेरी नजर में बहस बाजार पर होनी चाहिये . आज पत्रकारिता एक बाजार बन गई है या कह सकते हैं बाजार पत्रकारिता में प्रतिबिंबित होने लगा है. चाहे न्यूज चैनल हों या फिर प्रिंट मीडिया सभी बाजार से संचालित हो रहे हैं. सभी बाजार का एक हिस्सा बन गए है. मांग और पूर्ति का नियम यहां भी लागू है. जो बिक रहा होता है दुकानदार उसे ही अपने शोकेस में स्थान देता है ठीक यही स्थितियां मीडिया के सामने हैं . टीआरपी और सर्कुलेशन की लड़ाई में कई बार पत्रकारिता के मानदंड तारतार हो रहे है.
कुछ दिनों पहले दिलीप मंडल जी ने कहा है कि अगर नंदीग्राम में टीवी कैमरा नहीं होता, तो सीपीएम को शायद इतनी शर्म न आ रही होती।मैं भी उनकी बात से सहमत हूं लेकिन कितनी बार यही कैमरा आमजनमानस के साथ पत्रकारिता को भी शर्मशार करता है. कुछ दिन पहले ही एक युवती का नग्न होकर सड़क पर निकल पड़ना और उसका बार-बार न्यूज चैनलों में प्रदर्शन क्या साबित करता है. उसकी आवाज उठाएं यह गलत नहीं है लेकिन नग्नता का प्रदर्शन उचित है क्या? यदि यह प्रश्न उठाया जाये तो लोग कहेंगे कि मीडिया उसकी आवाज उठा रहा था लेकिन मीडिया आवाज के परिप्रेक्ष्य में एक सनसनाहट दिखाकर कुछ और बढ़ा रहा था.
आज की सुर्खियां रेप की घटनाएं बनती है. ऐसा कोई दिन नहीं जिस दिन इन घटनाओं को चासनी में डालकर पेश न किया जाता हो. खोजी पत्रकारिता के नाम पर रेप, भूत-प्रेत, सेक्स और कुछ इस जैसा ही दिखाया जा रहा है. दरअसल सनसनी के चक्कर में जो मिल रहा है उसे ही रंग कर प्रस्तुत करने के आदी होते जा रहे पत्रकार स्वयं पत्रकारिता भूल रहे हैं.
रही बात खोजपरक खबरों की तो यदि वो कारपोरेट जगत की हुई तो उसपर हाई लेबल पर ही सौदे हो जाते है या फिर यदि प्रशानिक स्तर की कोई बड़ी खबर हुई तो वह बेहतर संबंधों के नाम पर तो कई बार पैसों से मैनेज हो जाती है. तो ऐसे में सिर्फ रह जाती है घटना प्रधान खबरें. तो फिर शुरू हो जाती है चासनी लगा कर प्रस्तुतिकरण.
फिर चाहे वह भूतं शरणं गच्छामि हो या फिर सास बहू के झगड़े. कुछ न मिला तो बिपाशा और जॉन का झगड़ा तो मिल ही जाएगा.
आज न तो शिक्षा के मामले में कुछ बोला जा रहा न ही लिखा जा रहा न ही स्वास्थ्य के बारे में . और भी खबरे हैं जो जनहित से सरोकार रखती हैं लेकिन उन्हें कोई स्थान नहीं है. क्योंकि उनसे सर्कुलेशन या टीआरपी नहीं बढ़नी.
दूसरी ओर एक पुलिस वाले की सड़क दुर्घटना में मौत होती है तो वह बड़ी खबर बनती है लेकिन यदि कोई गरीब कुचल जाता है तो छोटा सा स्थान या फिर संक्षिप्त में सिमट जाता है. जहां जिंदगी के ऐसे दोहरे मापदंड हो तो स्वयं ही समझा जा सकता है कि पत्रकारिता की स्थिति क्या है.
हालांकि यह लंबी बहस का मुद्दा है क्योंकि आज पत्रकारिता और बाजार एक दूसरे के पूरक हो गए हैं और बिना एक दूसरे के चल भी नहीं सकते .

1 comment:

परमजीत सिहँ बाली said...

सही मुद्दा उठाया है।आज यही कुछ तो हो रहा है।