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Friday, October 12, 2007

कड़े सुरक्षा घेरे में आजमगढ़ ले जाया गया अबू सलेम

मुंबई पुलिस के कड़े सुरक्षा घेरे में अण्डर वर्ल्ड डॉन अबू सलेम को उसके गृह ग्राम आजमगढ़ ले जाया गया. उसे वहां उसकी मां के अंतिम संस्कार के लिए ले जाया गया है. इसकी जानकारी काफी गोपनीय रखी गई है. इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जिस ट्रेन से उसे ले जाया गया है उसके यात्रियों तक को इसकी भनक नहीं लगने दी गई . उसे पांच दिन बाद महाराष्ट्र ले जाया जाएगा.
सतना रेलवे स्टेशन में आज कड़े सुरक्षा इंतजाम किये गये थे लेकिन कारण किसी को पता नहीं था. डाउन महानगरी एक्सप्रेस रात ८ बजकर दस मिनट पर जेसे ही सतना पहुंची उसकी जनरल बोगी को स्थानीय जीआरपी और आरपीएफ के जवानों ने घेर लिया . आज ट्रेन अपने नियत प्लेटफार्म पर न आकर सबसे किनारे वाले प्लेटफार्म पर लाई गई. ट्रेन जब रुकी तो उस बोगी के सभी खिड़की दरवाजे बंद थे. तभी अचानक एक खिड़की खुली और सलेम ने चाय वाले वेंडर को पुकारा तभी एक झलक मीडिया को मिल पाई. हालांकि मीडिया से अबू सलेम को दूर रखने पूरा इंतजाम किया गया था. इस बोगी को बर्थ के दोनो ओर रस्सियों की जाली बना दी गई थी और एक दर्जन जवान वहां आधुनिक शस्त्रों के साथ तैनात थे. खबर है कि इलाहाबाद या बनारस से ट्रेन चेंज की जाएगी . तथा यह भी पता चला है कि आजमगढ़ से कुछ स्टेशन पहले उसे उतार कर विशेष वाहन से अंतिम संस्कार स्थल तक ले जाया जाएगा.
मोनिका के नाम पर ठिठका सलेम
कुछ ही पलो का जब मौका मिला तब सलेम से जब मोनिका के बारे में बात की गई तो वह ठिठका और घूरते हुए संवाददाता की आंखों मे आंखे डाल कर फिर सिर झुका लिया तभी अंदर से खिड़की बंद कर दी गई . बोगी के अंदर किसी को प्रवेश नहीं करने दिया गया . स्थानीय जीआरपी को भी परमिशन नहीं दी गई. सुरक्षा के लिये कुछ घंटे पहले ही आरपीएफ को सूचना दी गई थी. इसके अलावा ट्रेन की अन्य बोगियों में भी सादी वर्दी में जवान तैनात थे.

Tuesday, October 9, 2007

देहव्यापार का ऑन लाइन बढ़ता कारोबार

मध्यप्रदेश के व्यापारिक शहरों में बढ़ रहे देह व्यापार के कारोबार का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सतना जैसे मझोले शहर भी ऑन लाइन देह व्यापार के कारोबारियों के निशाने पर आ गए है. बकायदा वेब पेज बना कर उसमें मोबाइल नम्बर देकर चाही गई जगह पर देह उपलब्ध करने वालों ने खुलेआम कामन चैट रूम में जाकर अपना प्रचार भी कर रहे है.
ऐसा ही एक मामला विगत दिवस जियोसिटी के एक वेबपेज में खुली सेक्स दुकान से सामने आया है.
यह वेबसाइट नियत राशि अदा करने पर चाही गई जगह पर कॉल गर्ल या कॉल ब्वाय भेजने की व्यवस्था कराती है. जो शहर इस साइट में कॉल गर्ल भेजने के लिये बताए गए हैं उनमें प्रदेश की राजधानी भोपाल सहित इन्दौर जबलपुर, सतना , ग्वालियर और इटारसी हैं. यह कारोबार किस सीमा तक पहुंच गया है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इस वेबपेज में संपर्क करने के लिये बकायदा दो मोबाइल नम्बर दिये हैं.
आज के समय में इन्टरनेट देह के व्यापारियों के लिये सबसे सुरक्षित स्थान माना जाने लगा है और तेजी से फल फूल रहा है. इसकी सहायता से लोग बेखौफ होकर देह का कारोबार कर रहे हैं. इसी कारोबार का नमूना है जियोसिटी में लव नाम से बना वेबपेज. इसमें शुरुआत में कॉल गर्ल और कॉल ब्वाय की दुनिया में आने का स्वागत किया गया है. फिर आगे देश के किसी भी शहर के लिये निर्धारित राशि अदा करके सुविधा लेने की बात कही गई है. संपर्क के लिये बुकिंग का समय सुबह 10 बजे से दोपहर बाद 3 बजे तक का निर्धारित किया गया है तथा रविवार का दिन अवकाश घोषित है. यहां कॉल गर्ल की दर तीन हजार से 25 हजार तथा कॉल ब्वाय की दर 25 से 80 हजार तक बताई गई है. इसके बाद नीचे उन शहरों की सूची दी गई है जहां देह की सुविधा उपलब्ध करा सकते है. इसमें देश के सभी प्रमुख नगर भी शामिल है.
वहीं दूसरी ओर कॉल ब्वाय के लिये विज्ञापन भी दिया गया है . साथ ही मोनिका नामक छद्म आईडी द्वारा याहू मैसेन्जर के कामन रूम में बकायदे इस साइट का प्रचार किया जा रहा है.
अंत में यह बताया गया है कि इनकी किसी भी सेवा का लाभ लेने के लिये 50 फीसदी राशि अग्रिम तौर पर उनके बैंक अकाउंट में जमा करना पड़ेगा.

Tuesday, October 2, 2007

चिट्ठा जगत और नारद को क्या हो गया?

काफी देर से इन्हें खोलने का प्रयास कर रहा लेकिन सफल नहीं हो रहा? क्या मेरे कम्प्यूटर में कोई खराबी है या इन्हें किसी की नजर लग गई है?

Wednesday, September 26, 2007

सर्वश्रेष्ठ असफल क्यों?

क्या आपने कभी सोचा है कि अस्पताल, स्कूल या अन्य सरकारी संस्थाएं जहां सरकार कई चरणों की भर्ती प्रक्रिया के बाद बेहतरीन अभ्यर्थियों की भर्ती करती है फिर भी उनसे अपेक्षित सफलता क्यों नहीं मिल पाती है? स्कूल का मामला लें उन शिक्षकों की भर्ती होती है जिनकी योग्यता सर्वश्रेष्ठ होती है, वे प्रतियोगी परीक्षाओं में भी बेहतरीन अंक लाते हैं , उनका साक्षात्कार भी बेहतर होता है , भर्ती उपरांत इन्हें अच्छा खासा वेतन भी मिलता है लेकिन जब ये शिक्षक बन कर सरकारी स्कूलों में पढ़ाते हैं तो उन स्कूलों का परिणाम काफी कमजोर होता है. ठीक इसके दूसरी ओर निजी स्कूलों में कम तनख्वाह में अपेक्षाकृत कम योग्यता वाले शिक्षक शैक्षणिक दायित्व निभाते हैं इन्हें कम वेतन भी मिलता है लेकिन इन्हीं स्कूलों का परिणाम शानदार होता है. दूसरी ओर सरकारी अस्पतालों में बेहतरीन चिकित्सक रखे जाते हैं इन्हें भी अच्छे वेतन के साथ अच्छी खासी सरकारी सुविधाएं व अन्य फंड मिलते हैं लेकिन … इसके विपरीत निजी अस्पतालों में वे चिकित्सक जो सरकारी चयन में असफल रह जाते हैं उनको रखा जाता है लेकिन ज्यादातर मरीज सरकारी अस्पताल से यहां रेफर किये जाते हैं या फिर सरकारी की अपेक्षा निजी अस्पतालों में जाना पसंद करते हैं आखिर ऐसा क्यों … क्या यह माना जाए कि अब सर्वश्रेष्ठ असफल हो रहे हैं या सर्वश्रेष्ठता के मायने बदल गए हैं. जिस दिन इस पर विचार कर इस आधार पर योजनाएं तैयार होंगी तब शायद स्वास्थ्य व शिक्षा के बेहतर परिणाम मिलने लगेंगे.
वहीं इसका दूसरा पहलू और देखें - हम और आप सरकारी अस्पतालों में जाते हैं जहां पाते हैं गंदगी करने में कोई संकोच नहीं करते लेकिन निजी अस्पतालों में जाते ही तमाम निर्देशों का पालन करने लगते हैं. कचरा डस्टबीन में ही फेंकते हैं थूकने के लिए बाहर जाते हैं आदि… तो क्या हम सरकारी व्यवस्थाओं के सहयोगी नहीं हैं… इसमें भी व्यापक सुधार की आवश्यकता हैं वरना हम कह सकते हैं की निजीकरण ही ज्यादा बेहतर विकल्प है सफलता के लिये …

Friday, September 7, 2007

चैलेन्जः हिम्मत है तो एक फोल्डर बना कर दिखाएं


महोदय

आप सब को नमस्कार. मैं अपने कम्प्यूटर में एक फोल्डर बनाने की कोशिश करते-करते थक गया लेकिन con नाम से फोल्डर नहीं बना सका. अगर आप में दम है तो con नाम से फोल्डर बना कर दिखाएं यदि सफलता मिले तो उसके बनाने का तरीका बताएं और हो सके तो यह भी बताएं कि आखिर con नाम से फोल्डर साधारण तौर पर क्यों नहीं बनाया जा सकता है.

Tuesday, September 4, 2007

हीरा खदानों में अस्मत लुटाने को मजबूर अबला

चारों ओर हल्ला है कि महिलाओं की तस्वीर बदल रही है. लेकिन मेरे नजरिये से ऐसा कहने वाले तस्वीर का सिर्फ एक ही पहलू देख रहे हैं. यह सही है महिलाएं आज हर क्षेत्र में परचम लहरा रही हैं कई मामलों में पुरुषों को भी पीछे छोड़ रही हैं लेकिन ग्रामीण भारत की स्थिति आज भी जस की तस है. यह अलग बात है कि कुछ एक महिलाएं अपवाद स्वरूप आगे आ रही हैं लेकिन संपूर्ण स्थितियों का यदि आकलन किया जाए तो आज भी हम उन्हीं पुरातन मान्यताओं के दायरे में उन्हें कैद पाते हैं. आज भी गांवों में महिलाएं शोषण और उत्पीड़न का शिकार हैं.
और तो और कई जगह तो महिलाओं की यह स्थिति है कि उन्हें उस व्यवस्था से गुजरना पड़ता है जिन्हें आज का समाज और कानून कहीं से मान्यता नहीं देता है.
भारत की सबसे प्रसिद्ध पन्ना की हीरा खदानों में महिला उत्पीड़न का नजारा सामान्यतौर पर देखने को मिल सकता है कुछ यही हालात चित्रकूट के तराई अंचल में चलने वाली खदानों के भी हैं. यहां की उथली हीरा खदानों में हजारों की संख्या में महिलाएं काम करती है. इन हीरा खदानों में शुरुआती चरण में जब खुदाई होती है और कठोर पत्थर निकलता है तब तक तो हालात सामान्य रहते हैं लेकिन जैसे ही खदान में भुरभुरा पर मिलता है तो महिलाओं की इज्जत का काला अध्याय यहां के स्थानीय ठेकेदार लिखना शुरू कर देते हैं. दरअसल भुरभुरी मिट्टी को छानने धोने की प्रक्रिया की जाती है क्योंकि इसी में हीरा मिलने की संभावना सबसे ज्यादा रहती है. रोज शाम को जब मजदूर काम करके वापस जाने लगते हैं तो शुरू होता है इनकी तलाशी का दौर . इस दौरान बाकायदे सबको निर्वस्त्र करके तलाशी ली जाती है. चाहे वह पुरुष हो या महिला . और तलाशी लेने वाले ठेकेदार के आदमी होते हैं. महिला की तलाशी भी वही लेते है. अब कल्पना कीजीए कि इस दौरान महिला को किस स्थिति का सामना करना पड़ता होगा. कई बार तो तलाशी हैवानियत की हद तक पहुंच जाती है और तलाशी के नाम पर गुप्तांगों को भी नहीं बख्शा जाता. लेकिन अब यहां काम करने वाली महिलाएं इन सबकी आदी हो गई है. यहां शासन की रोजगार दिलाने की तमाम योजनाएं चलने के बाद भी वे इन तक नहीं पहुंच पा रही है और महिलाओं को इस प्रथा से मुक्ति नहीं मिल पा रही है. यहां काम करने वाला तबका ज्यादा तर वनवासी व आदिवासी है. जिसे शासन व उसकी योजनाओं का कोई ज्ञान नहीं है. कुछ यही हाल चित्रकूट के तराई क्षेत्र का है. यहां हर दिन महिलाओं की अस्मत से खेला जाता है. यहां काम करने वाली महिलाएं ज्यादातर ठेकेदार और उनके गुर्गों की हवस पूर्ति का साधन बन चुकी है. दरअसल यह क्षेत्र दस्यु प्रभावित है. यहां काम करने से सरकारी अमला डरता है और यदाकदा कोई सूचना मिलती भी है तो उसके निराकरण के लिये जाने से कतराता है. इसलिये यहां दैहिक शोषण जीवनशैली बन चुका है. और महिलाएं भी इसे अपने व्यवहार में शामिल कर चुकी हैं. हालात यहां इतने बदतर हैं कि इनके बच्चे बाहर खेल रहे होते हैं और अंदर झोपड़े में कोई इनकी अस्मत से खेल रहा होता है.
... अब इन परिस्थितियों को देख कर कौन कहेगा कि आज महिलाओं की तस्वीर बदल रही है. हां यह जरूर है तस्वीर का एक पहलू बदल रहा है .

भारत में सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार न्यायाधीश के सामने


देश में यदि भ्रष्टाचार दूर करने की मुहिम शुरू हो तो उसमें सबसे बड़ी बाधा न्यायालय ही होगा. हमेशा अखबारों और न्यूज चैनलों में यह खबर प्रमुखता से दी जाती है कि विश्व के सर्वाधिक भ्रष्ट देशों में भारत फलां नम्बर पर... फिर बताया जाता है कि भारत में सर्वाधिक भ्रष्ट नेता हैं फिर पुलिस व प्रशासनिक अधिकारी हैं. लेकिन मेरी नजर में सबसे ज्यादा भ्रष्ट लोग न्यायालय के अंदर ही बैठे है. किसी भी लोवर कोर्ट में चले जाइए ... वहां बड़ी सहजता से खुले आम घूस लेते लोग आपको मिल जाएंगे. वो भी जज के सामने , लेकिन मजाल क्या किसी की कोई घूस देने से इंकार कर दे.अमूमन वादी - प्रतिवादी किसी को भी कोर्ट में अपनी पेशी बढ़वानी है या कोई दस्तावेज सम्मिलित करवाना है तो वहां कोर्ट के अंदर ही आपको वहां बैठे बाबू को पैसे देने ही होंगे. अपको किसी दस्तावेज की नकल लेना है तो पैसे देने ही होंगे. कोर्ट के रिकार्ड रूम से कोई दस्तावेज लेना है तो पैसे देने होंगे, कोई आवेदन लगाना हो तो पैसे लगेंगे. और यह सब जज के सामने ही खुलेआम होता है. क्या जज की निगाहें यहां नहीं जाती ....लेकिन मामला न्यायपालिका का है तो बोले कौन . फिर हम सुविधाभोगी हो ही चुके है, हमें आदत पड़ गई है गलत तरीके का पालन करने की तो फिर यहां सब जायज है. लेकिन मेरी नजर में भारत में सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार है तो वह है न्यायपालिका में वह भी जज के सामने लेकिन कभी यह मामला न तो लिखा गया न ही दिखाया गया......है कोई माई का लाल जो इस पर रोक लगाने की बात कर सके ...... लेकिन मुझमें तो नहीं है यह हिम्मत क्योंकि शायद मैं अकेला ही खड़ा नजर आउंगा .... और अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता.